bharat ke sanvidhan ki prastavana likhen : भारतीय संविधान की प्रस्तावना क्या है

bharat ke sanvidhan ki prastavana likhen
दोस्तों, भारत के मूल संविधान में प्रस्तावना, 395 अनुच्छेद, 22 भाग और आठ अनुसूचियां थी। इस संविधान का निर्माण संविधान सभा के द्वारा किया गया था। आज इस bharat ke sanvidhan ki prastavana likhen पोस्ट के माध्यम से भारतीय संविधान के प्रस्तावना के बारे में विस्तृत जानकारी प्राप्त करेंगे। इसलिए इस पोस्ट को अंत तक अवश्य पढ़ें।

भारतीय संविधान का प्रस्तावना

       भारत का संविधान 

               उद्देशिका

हम, भारत के लोग, भारत को एक संपूर्ण प्रभुत्व- संपन्न, समाजवादी, पंथ-निरपेक्ष, लोकतंत्रात्मक गणराज्य बनाने के लिए तथा उसके समस्त नागरिकों को : 

सामाजिक, आर्थिक और राजनैतिक न्याय, विचार अभिव्यक्ति, विश्वास, धर्म और उपासना की स्वतंत्रता, प्रतिष्ठा और अवसर की समता प्राप्त कराने के लिए तथा उन सब में व्यक्ति की गरिमा और राष्ट्र की एकता और अखंडता सुनिश्चित करने वाली बंधुता बढ़ाने के लिए
दृढ़ संकल्प होकर अपनी इस संविधान सभा में आज तारीख 26 नवंबर, 1949 ई.( मिति मार्ग शीर्ष शुक्ला सप्तमी संवत दो हजार छह विक्रमी) को एतदद्वारा इस संविधान को अंगीकृत, अधिनियमित और आत्मार्पित करते हैं।

प्रस्तावना से आप क्या समझते हैं

• भावना प्रस्तावना किसी दस्तावेज का परिचयात्मक कथन होता है, जो उसे दस्तावेज के दर्शन और उद्देश्यों को स्पष्ट करता है।

• एक संविधान में प्रस्तावना संविधान निर्माता के इरादे इसके निर्माण के पीछे का इतिहास को प्रस्तुत करता है और राष्ट्र के मूल मूल्य एवं सिद्धांत को प्रदर्शित करता है।

भारतीय संविधान की प्रस्तावना मूलत निम्नलिखित बातों या वस्तुओं पर विचार देती है:-

✓संविधान का स्रोत

✓भारतीय राज्य की प्रकृति

✓इसके उद्देश्यों का विवरण

✓इसके गोद लेने की तिथि

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भारतीय संविधान की प्रस्तावना का इतिहास क्या है? जानें

• पंडित जवाहरलाल नेहरू द्वारा संविधान सभा में उद्देश्य प्रस्ताव लाया गया था। इसे 22 जनवरी 1947 को संविधान सभा के द्वारा अपना लिया गया था। यही भारत के संविधान के प्रस्तावना बना।

• यद्यपि अदालत में प्रस्तावना को लागू नहीं किया जा सकता। प्रस्तावना संविधान के उद्देश्यों को स्पष्ट करती है, एवं जब-जब भाषा अस्पष्ट प्रतीत होती है, तो लेखों की व्याख्या के दौरान हमारे संविधान की प्रस्तावना सहायता के रूप में कार्य करती है।

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भारतीय संविधान की प्रस्तावना के घटक के बारे में जानें

✓प्रस्तावना से यह संकेत मिलता ,है की संविधान के अधिकार का स्रोत भारत के लोगों के पास है।

✓प्रस्तावना में भारत को संप्रभु समाजवादी धर्मनिरपेक्ष और लोकतांत्रिक गणराज्य घोषित किया गया है।

✓प्रस्तावना में संविधान सभा द्वारा संविधान को अंगीकृत किए जाने की तारीख का उल्लेख किया गया है। संविधान को संविधान सभा के द्वारा 26 नवंबर 1949 को अपनाया गया था।

✓प्रस्तावना में बताए गए उद्देश्य निम्नलिखित है:- 

• सभी नागरिकों के लिए न्याय,

• स्वतंत्रता,

• समानता सुनिश्चित करना,

• राष्ट्र की एकता और अखंडता को बनाए रखना,

•  भाईचारे को बढ़ावा देना,

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प्रस्तावना के मुख्य शब्द के बारे में

हम, भारत के लोग:- भारतीय संविधान की प्रस्तावना हम भारत के लोग से शुरू होता है। यह भारत के लोगों की अंतिम संप्रभुता को प्रदर्शित करता है।यह बताता है, भारत  किसी अन्य राज्य या बाहरी शक्ति के नियंत्रण के अधीन नहीं है।

संप्रभु:- इस शब्द का अर्थ है कि भारत अपने आप में संप्रभु है। हर प्रकार से स्वतंत्र है। यह किसी अन्य बाहरी शक्ति के प्रभुत्व के अधीन नहीं है। देश में विधायिका के पास कानून बनाने की शक्ति है, जो संविधान के अधीन है, ना कि किसी बाहरी शक्ति के।

समाजवादी:- समाजवादी शब्द का अर्थ है, लोकतांत्रिक तरीके से समाजवादी की उपलब्धि हमारे देश में मिश्रित अर्थव्यवस्था में विश्वास रखा जाता है। यहां पर निजी और सार्वजनिक दोनों क्षेत्र साथ-साथ मौजूद रहते हैं।

 Note :-समाजवादी शब्द को 42 वां संविधान संशोधन 1976 के माध्यम से प्रस्तावना में जोड़ा गया है।

धर्मनिरपेक्ष:- इस शब्द का अभिप्राय है कि भारत में सभी धर्म को समान रूप से सम्मान सुरक्षा एवं समर्थन दिया जाता है।

Note:- धर्मनिरपेक्ष शब्द को 42 वां संविधान संशोधन 1976 के माध्यम से प्रस्तावना में सम्मिलित किया गया है।

लोकतांत्रिक :-लोकतांत्रिक शब्द का तात्पर्य यह है कि भारत के संविधान का एक स्थापित रूप है, जो चुनाव में व्यक्त लोगों की इच्छा से अपना अधिकार प्राप्त करता है। हमारे देश में सार्वभौमिक मताधिकार प्रदान किया गया है।

गणतंत्र :– गणतंत्र शब्द का अभिप्राय यह है, कि राज्य का प्रमुख भारत के लोगों के द्वारा चुना जाता है।  भारत का राष्ट्रपति राज्य का निर्वाचित प्रमुख होता है। राष्ट्रपति ही राष्ट्र का प्रमुख या मुखिया होता है।राष्ट्रपति के नाम पर ही राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय सभी कार्य किए जाते हैं।

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भारतीय संविधान का उद्देश्य

• भारत का संविधान ही सर्वोच्च कानून है। यह समाज में अखंडता को बनाए रखना एवं बढ़ावा देने में मदद करता है। एक महान राष्ट्र के निर्माण के लिए नागरिकों के बीच एकता होना परम आवश्यक होता है।

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भारतीय संविधान का उद्देश्य पूरे देश में सद्भाव को बढ़ावा देते हुए समृद्धि को प्राप्त करना है।

इस उद्देश्य को प्राप्त करने में सहायता करने वाले निम्नलिखित कारक हैं:- 

न्याय:- समाज में व्यवस्था बनाए रखना परम आवश्यक होता है, जिसका वादा मौलिक अधिकारों एवं राज्य के नीति निर्देशक सिद्धांतों के द्वारा भारत के संविधान में प्रदान किया गया है।

इसमें तीन तत्व शामिल हैं:- 

• सामाजिक आर्थिक और राजनीतिक।

∆ सामाजिक न्याय:– इसका अभिप्राय है, संविधान जाति पंथ लिंग धर्म आदि किसी भी आधार पर भेदभाव को समाप्त कर देश में समानता स्थापित करना चाहता है।

∆ आर्थिक न्याय:- आर्थिक न्याय का अभिप्राय है, लोगों के साथ उनकी संपत्ति आए एवं आर्थिक स्थिति के आधार पर किसी भी प्रकार का भेदभाव ना किया जाए। प्रत्येक व्यक्ति को समान पद के लिए समान रूप से ही भुगतान करना पड़े एवं सभी लोगों को अपने जीवन यापन के लिए कमाने का अवसर प्राप्त हो।

∆ राजनीतिक न्याय:– राजनीतिक न्याय का अभिप्राय है, सभी लोगों को बिना किसी भी प्रकार का भेदभाव का सामना किए राजनीतिक अवसरों में सम्मिलित होने का समान स्वतंत्र और निष्पक्ष अधिकार प्राप्त है।

सामानता:- सामान्य शब्दों का मतलब है, कि समाज के किसी भी वर्ग को किसी विशेष अधिकार न दिया गया हो एवं सभी लोगों को बिना किसी भेदभाव के हर चीज के लिए समान अवसर प्राप्त हो कानून के समक्ष हर कोई है।

• स्वतंत्रता:- स्वतंत्रता शब्द का अभिप्राय है, सभी लोगों को अपने जीवन शैली अपने अनुसार चुनने, राजनीतिक विचार रखने एवं समाज में व्यवहार करने की स्वतंत्रता प्रदान करना। आजादी का मतलब कुछ भी करने की आजादी नहीं है, इस बात का ध्यान रखना होगा क्योंकि व्यक्ति कानून द्वारा निर्धारित सीमा के अतिरिक्त कुछ भी कर सकता है।

• बंधुत्व:- बंधुत्व शब्द का मतलब है, भाईचारे की भावना और देश एवं सभी लोगों के साथ भावनात्मक लगाव को बढ़ावा देना बंधुत्व राष्ट्र में गरिमा एवं एकता को बढ़ावा देने में मदद करता है।

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प्रस्तावना में वर्णित उद्देश्यों का महत्व

यह लोगों को जीवन जीने का एक तरीका प्रदान करता है। इसमें खुशहाली की अवधारणा के रूप में स्वतंत्रता समानता एवं बंधुत्व शामिल है। इन सभी को किसी के द्वारा छीना नहीं जा सकता है।

• स्वतंत्रता को सामान्य से अलग नहीं किया जा सकता, ठीक वैसे ही सामानता को स्वतंत्रता से अलग नहीं किया जा सकता। ना ही स्वतंत्रता और समानता को भाईचारे से अलग कर सकते हैं।

• समानता के बिना स्वतंत्रता बहुसंख्यक लोगों पर कुछ लोगों का वर्चस्व पैदा कर सकती है।

• स्वतंत्रता के बिना सामानता व्यक्ति के विकास को प्रतिबंधित कर सकती है।व्यक्तिगत पहल को समाप्त कर सकती है।

• बंधुत्व के बिना स्वतंत्रता अनेक लोगों पर कुछ लोगों का प्रभुत्व उत्पन्न कर सकती है।

• बंधुत्व के बिना स्वतंत्रता एवं समानता का स्वाभाविक काम बन ही नहीं सकता है।

इसलिए यदि किसी समाज में विकास को बढ़ावा देना हो तो वहां पर बंधुत्व, समानता एवं स्वतंत्रता इन तीनों पर काम करना होगा।

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अंत तक पढ़ने के लिए धन्यवाद।💐💐

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