Bhartiya sanvidhan ki visheshtaon ka varnan kijiye : भारतीय संविधान की विशेषताएं

दोस्तों, भारत में संविधान ही सर्वोच्च विधान है। भारतीय संविधान 26 नवंबर 1949 को संविधान सभा द्वारा पारित हो गया था। 26 जनवरी 1950 को संपूर्ण रूप से लागू कर दिया गया था। यदि आप भारतीय संविधान के विशेषताओं के बारे में विशेष जानकारी प्राप्त करना चाहते हैं, तो इस Bhartiya sanvidhan ki visheshtaon ka varnan kijiye पोस्ट को अंत तक अवश्य पढ़ें। इस पोस्ट को पढ़ने के पश्चात भारतीय संविधान के विशेषताओं से संबंधित जानकारी प्राप्त करने के लिए आपको कहीं और जाने की जरूरत नहीं पड़ेगी।

संविधान का संक्षिप्त परिचय

भारतीय संविधान में 395 अनुच्छेद, 12 अनुसूचियां एवं 25 भाग हैं। हालांकि मूल संविधान में 395 अनुच्छेद , 8 अनुसूचियां एवं 22 भाग ही थे। परंतु वर्तमान में बढ़कर 12 अनुसूचियां एवं 25 भाग हो गए हैं।

Table of Contents

हमारे संविधान में भारत के संसदीय स्वरूप की विस्तृत व्यवस्था की गई है। भारतीय संविधान की संरचना संघीय है।भारतीय संविधान इसकी प्रस्तावना के साथ शुरू होता है।

भारतीय संविधान की प्रस्तावना में इसके आदर्श उद्देश्य एवं बुनियादी सिद्धांत शामिल है। भारतीय संविधान की मुख्य विशेषताएं इन उद्देश्यों से ही प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष रूप से विकसित हुई है, जो की प्रस्तावना से प्रवाहित होती है।

भारतीय संविधान ने अपने देश की आवश्यकता के अनुसार विश्व के अधिकांश प्रमुख संविधानों को पढ़ने के पश्चात उसके सर्वोत्तम विशेषताओं को अपने में समाहित किया है।हालांकि भारत का संविधान को कई देशों से उधार लिया हुआ कहा जाता है।

लेकिन ऐसा बिल्कुल भी नहीं है। क्योंकि संविधान निर्माताओं ने विश्व के संविधानों को पढ़ने के पश्चात उनके प्रमुख विशेषताओं को अपने भारत के परिस्थितियों के अनुसार संशोधित करने के पश्चात ही अपने संविधान में शामिल किया है।

इसलिए यह कहना कि भारत का संविधान उधार का संविधान है, या नकल मात्र है, उचित नहीं होगा।

भारत का संविधान अद्वितीय है। इसमें अपनी परिस्थितियों के अनुसार अपने आप को अनुकूलित करने की क्षमता व्याप्त है। भारतीय संविधान एकात्मक और संघात्मक दोनों का मिश्रित स्वरूप है।

आवश्यकता के अनुसार अपने आप को परिवर्तित करते रहता है। इसीलिए तो भारत के संविधान को जीवंत संविधान भी कहा जाता है।

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भारत के संविधान के प्रमुख विशेषताएं निम्नलिखित है:-

(1). सबसे लंबा एवं लिखित संविधान

दुनिया के सभी संविधानों को अमेरिकी संविधान की तरह लिखित या ब्रिटिश संविधान की तरह अलिखित संविधानों में विभाजित किया गया है।

भारतीय संविधान को दुनिया का सबसे लंबा एवं विस्तृत संवैधानिक दस्तावेज होने का गौरव प्राप्त है।

दूसरे शब्दों में कहा जाए तो, भारत का संविधान दुनिया के सभी लिखित संविधानों में सबसे लंबा एवं विस्तृत है। यह संविधान बहुत ही व्यापक और विस्तृत दस्तावेज का रूप धारण किया हुआ है।

तो आइए अब जानते हैं कि भारतीय संविधान के विशाल आकार होने में किन कारकों का अहम योगदान है:-

• भौगोलिक कारक, यानी भारत देश की विशालता एवं इसकी विविधता।

• ऐतिहासिक कारक, उदाहरण के लिए, 1935 के भारत सरकार अधिनियम का अत्यधिक प्रभाव।

• केंद्र और राज्यों दोनों के लिए एक ही संविधान की व्यवस्था।

• संविधान सभा में कानूनी दिग्गजों का बोलबाला ।

भारतीय संविधान में न केवल शासन के मौलिक सिद्धांत का वर्णन किया गया है। बल्कि विस्तृत प्रशासनिक प्रावधान भी दिए गए हैं।

भारतीय संविधान में न्याय संगत और गैर- न्यायिक दोनों अधिकारों को शामिल किया गया है। इसलिए भारतीय संविधान का आकार अन्य संविधानों के अपेक्षा अधिक व्यापक हो गया है।

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(2) विभिन्न स्रोतों से लिया गया

भारतीय संविधान ने अपने अधिकांश प्रावधानों को विभिन्न देशों के संविधानों के साथ-साथ भारत शासन अधिनियम, 1935 से भी प्रावधानों को अपने आप में सम्मिलित किया है।

डॉ भीमराव अंबेडकर ने संविधान सभा में गर्व से कहा था, कि भारत के संविधान को दुनिया के सभी ज्ञात संविधानों का निचोड़ने के पश्चात तैयार किया गया है।

संविधान का संरचनात्मक हिस्सा काफी हद तक भारत शासन अधिनियम 1935 से ग्रहण किया गया है। भारतीय संविधान का दार्शनिक हिस्सा जैसे मौलिक अधिकार एवं राज्य के नीति निर्देशक सिद्धांत को क्रमशः अमेरिकी और आयरलैंड के संविधानों से लिया गया है।

संविधान का राजनीतिक हिस्सा जैसे कैबिनेट सरकार का सिद्धांत एवं कार्यपालिका और विधायिका के बीच संबंध काफी हद तक ब्रिटिश संविधान से लिया गया है।

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(3). कठोरता और लचीलेपन का मिश्रण स्वरूप

भारतीय संविधान कठोर और लचीले संविधान का मिश्रित स्वरूप का अनूठा उदाहरण है। किसी भी संविधान को उसकी संशोधन प्रक्रिया के अनुसार कठोर या लचीला संविधान के रूप में वर्गीकृत किया जाता है।

कठोर संविधान उसे कहा जाता है, जिसके संशोधन के लिए एक विशेष प्रक्रिया की आवश्यकता पड़ती है।

उदाहरण के लिए, अमेरिकी संविधान ।

वैसे ही एक लचीला संविधान उसे कहा जाता है जिसे सामान्य कानून के तरह संशोधित कर सकते हैं।

उदाहरण के लिए, ब्रिटिश का संविधान

भारतीय संविधान संशोधन की प्रकृति के आधार पर सरल से लेकर सबसे कठिन प्रक्रियाओं तक तीन प्रकार के संशोधन की प्रक्रिया प्रदान करता है। इसलिए कहा जाता है कि भारत का संविधान नम्य और अनम्य दोनों का मिश्रित स्वरूप को धारण किया हुआ है।

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(4). संघात्मक और एकात्मकता का मिश्रण

भारतीय संविधान, सरकार की एक संघीय प्रणाली को स्थापित करता है। इसमें एक संघ की सभी सामान्य विशेषताओं को शामिल किया गया है।

जैसे:-

• दो सरकारें,

• शक्तियों का विभाजन,

• लिखित संविधान ,

• संविधान की सर्वोच्चता,

• संविधान की कठोरता,

•स्वतंत्र न्यायपालिका

• द्विसदनीयता।

हालांकि, भारतीय संविधान में बड़ी संख्या में एकात्मक या गैर- संघीय विशेषताएं भी मौजूद है।

जैसे की:-

• एक मजबूत केंद्र,

• एकल संविधान,

• केंद्र द्वारा राज्य के राज्यपाल की नियुक्ति,

• अखिल भारतीय सेवाएं,

• एकीकृत न्यायपालिका की व्यवस्था आदि ।

इसके अतिरिक्त संविधान में कहीं भी फेडरेशन शब्द का उल्लेख नहीं किया गया है।

भारतीय संविधान का अनुच्छेद 1 भारत को राज्यों के संघ के रूप में वर्णित करता है, जिसका तात्पर्य दो चीजों से है:-

(1) भारतीय संघ राज्यों के समझौते का परिणाम नहीं है।

(2). किसी भी राज्य को संघ से अलग होने का अधिकार नहीं है।

इसलिए के.सी व्हेयर के द्वारा कहा गया है, कि भारत का संविधान का रूप संघीय है, लेकिन भावना में एकात्मक है। अर्थात भारतीय संविधान को अर्ध-संघीय के रूप में वर्णित किया गया है।

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(5). सरकार का संसदीय स्वरूप

भारतीय संविधान ने सरकार की अमेरिकी राष्ट्रपति प्रणाली के बजाए सरकार की ब्रिटिश संसदीय प्रणाली को अपनाया है। संसदीय प्रणाली विधायक और कार्यकारी अंगों के बीच सहयोग एवं समन्वय के सिद्धांत पर कार्य करता है।

जबकि राष्ट्रपति प्रणाली दो अंगों के बीच शक्तियों के पृथक्करण के सिद्धांत पर कार्य करता है ।भारत की संसदीय प्रणाली को जिम्मेदार सरकार या कैबिनेट सरकार या वेस्ट मिस्टर मॉडल के रूप में भी जाना जाता है।

भारतीय संविधान द्वारा न केवल केंद्र में बोल के राज्यों में भी संसदीय प्रणाली की व्यवस्था किया गया है। संसदीय प्रणाली में प्रधानमंत्री के भूमिका अहम होती है। इसलिए इसे प्रधानमंत्री स्तरीय सरकार भी कहा जाता है।

भारत में संसदीय सरकार की विशेषताएं निम्नलिखित हैं:-

• बहुमत दल का शासन,

• कार्यपालिका का विधायिका के प्रति सामूहिक उत्तरदायित्व,

• विधायिका में मंत्रियों की सदस्यता,

• प्रधानमंत्री या मुख्यमंत्री का नेतृत्व ,

• निचले सदन लोकसभा या विधानसभा का विघटन,

• भारतीय संसद ब्रिटिश संसद के जैसे एक संप्रभु निकाय नहीं है।

• भारत की संसदीय सरकार में निर्वाचित राष्ट्रपति संवैधानिक मुखिया होता है।

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(6). संसदीय संप्रभुता और न्यायिक सर्वोच्चता

भारत की संसद के संप्रभुता का सिद्धांत ब्रिटिश के सांसद से लिया गया है। जबकि न्यायिक सर्वोच्चता का सिद्धांत अमेरिकी सुप्रीम से लिया गया है, लेकिन फिर भी भारतीय संसद की संप्रभुता ना तो बिल्कुल ब्रिटिश संसद की भांति है, और ना ही न्यायिक सर्वोच्चता का सिद्धांत बिल्कुल अमेरिकी सुप्रीम की भांति है।

ब्रिटिश संसद संप्रभु होता है, जबकि भारत में संविधान संप्रभु है। अमेरिकी संविधान भारतीय संविधान के अनुच्छेद 21 में निहित ‘कानून द्वारा स्थापित प्रक्रिया‘ के खिलाफ ‘कानून के उचित प्रक्रिया‘ प्रदान करता है।

इसलिए भारतीय संविधान निर्माताओं ने संसदीय संप्रभुता के ब्रिटिश सिद्धांत एवं न्यायिक सर्वोच्चता के अमेरिकी सिद्धांत के बीच एक उचित समायोजन को प्राथमिकता प्रदान की है।

सर्वोच्च न्यायालय अपनी न्यायिक समीक्षा की शक्ति के माध्यम से संसदीय कानून को और असंवैधानिक घोषित कर सकता है, तो वहीं संसद अपनी संवैधानिक शक्ति के माध्यम से विधान के अधिकांश भागों में संशोधन भी कर सकती है।

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(7). कानून का शासन

भारत के लोग कानून द्वारा शासित होते हैं, ना कि किसी व्यक्ति के द्वारा। अर्थात बुनियादी सत्यवाद है कि कोई भी व्यक्ति यहां कानून से ऊपर नहीं है। लोकतंत्र के लिए कानून व्यवस्था बेहद महत्वपूर्ण होता है।

इसका अधिक स्पष्ट अर्थ यह है कि लोकतंत्र में कानून ही सर्वोच्च विधान एवं संप्रभु होता है। अंतिम विश्लेषण में कानून के शासन का अर्थ यह हो सकता है, कि आम आदमी के सामूहिक ज्ञान ही संप्रभुता है।

इस महत्वपूर्ण अर्थ के अतिरिक्त कानून का शासन कुछ और चीजों का मतलब होता है जैसे की

• यहां मनमानी की कोई गुंजाइश नहीं होती है।

• प्रत्येक व्यक्ति को कुछ मौलिक अधिकार प्राप्त होते हैं।

• उच्चतम न्यायपालिका के पास कानून की पवित्रता को सुरक्षित बनाए रखने का अधिकार प्राप्त होता है।

भारतीय संविधान ने इस सिद्धांत को भाग 3 में शामिल किया हुआ है एवं अनुच्छेद 14 को अर्थ प्रदान करने के लिए (सभी कानून के समक्ष समान है एवं सभी कानून की समान सुरक्षा का अधिकार), लोक अदालतों का प्रचार एवं सर्वोच्च न्यायालय के द्वारा जनहित याचिका का प्रावधान किया गया है।

साथ ही साथ देश के कानून के अनुसार कोई भी वादी पीठासीन न्यायिक प्राधिकरण से अपील कर सकता है कि वह स्वयं अपने मामले में बहस करें या न्यायपालिका की मदद से कानूनी सहायता प्राप्त कर सके।

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(8). एकीकृत एवं स्वतंत्र न्यायपालिका की व्यवस्था

भारत में एकल न्यायपालिका प्रणाली की व्यवस्था की गई है। साथ ही भारतीय संविधान कार्यपालिका एवं विधायिका के प्रभाव से मुक्त होने के साथ-साथ भारतीय न्यायपालिका को सक्षम करके स्वतंत्र न्यायपालिका की स्थापना भी करता है।

सर्वोच्च न्यायालय न्यायिक प्रणाली के शीर्ष न्यायालय के रूप में भी काम करता है। सर्वोच्च न्यायालय के नीचे राज्य स्तर पर उच्च न्यायालय है। एक उच्च न्यायालय के तहत अधीनस्थ न्यायालय का एक पद अनुक्रम है, जो कि जिला अदालतों एवं अन्य निचली अदालतों के रूप में कार्य करते हैं।

सर्वोच्च न्यायालय को एक संघीय अदालत भी कहा जाता है। यह नागरिकों के मौलिक अधिकारों का गारंटी भी देता है। सर्वोच्च न्यायालय भारतीय संविधान का संरक्षक एवं भारत के लोगों के मूल अधिकारों का संरक्षक भी है।

इसलिए संविधान में न्यायपालिका की स्वतंत्रता सुनिश्चित करने के लिए विभिन्न प्रकार से प्रावधान किए गए हैं।

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(9). मौलिक अधिकार

भारतीय संविधान के भाग 3 में सभी नागरिकों के लिए 6 मौलिक अधिकारों की गारंटी दिया गया है। मूल संविधान में 7 मूल अधिकार का प्रावधान किया गया था।

परंतु 44 वां संविधान संशोधन अधिनियम 1976 के द्वारा संपत्ति के अधिकार को मूल अधिकार से हटाकर कानूनी अधिकार बना दिया गया।

भारतीय संविधान में मौलिक अधिकार भारतीय संविधान की महत्वपूर्ण विशेषताओं में से एक है। संविधान में मूल सिद्धांत है कि प्रत्येक व्यक्ति एक मनुष्य के रूप में कुछ अधिकारों का हकदार होता है, और इसलिए अधिकारों का उपभोग किसी बहुसंख्यक या अल्पसंख्यक की इच्छा पर निर्भर नहीं होना चाहिए।

किसी भी बहुसंख्यक को इन अधिकारों को निरस्त करने का अधिकार नहीं होता है।मौलिक अधिकार भारत में राजनीतिक लोकतंत्र के विचार को बढ़ावा देने हेतु प्रावधान किया गया है।

यह कार्यपालिका के निरंकुश्ता एवं विधायिका के मनमानी कानून की सीमाओं के रूप में कार्य करता है। मौलिक अधिकार प्रकृति में न्याय संगत है। अर्थात मौलिक अधिकार को कोई छीन नहीं सकता है।

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(10) राज्य के नीति निर्देशक सिद्धांत

बाबासाहेब भीमराव अंबेडकर के अनुसार राज्य के नीति- निर्देशक सिद्धांत भारतीय संविधान की एक नवीन विशेषता है। इसकी समायोजन संविधान के भाग- 4 में किया गया है।

भारतीय लोगों को सामाजिक और आर्थिक न्याय प्रदान करने हेतु नीति- निर्देशक सिद्धांतों को हमारे संविधान में शामिल किया गया था। नीति निर्देशक सिद्धांतों का उद्देश्य भारत में एक कल्याणकारी राज्य की स्थापना करना है। जहां पर कुछ लोगों के हाथों में धन का संकेंद्रण नहीं हो सकेगा ।

यह प्रकृति में न्यायोचित हैं। 1980 में मिनर्वा मिल्स मामले में कहा गया कि भारतीय संविधान की स्थापना मौलिक अधिकारों और निति- निदेशक सिद्धांतों के बीच संतुलन के आधार पर की गई है।

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(11). मौलिक कर्तव्य

भारत के मूल संविधान में नागरिकों के मौलिक कर्तव्यों का प्रावधान नहीं किया गया था। मूल कर्तव्य को स्वर्ण सिंह समिति के सिफारिश पर 42 वां संविधान संशोधन अधिनियम 1976 द्वारा शामिल किया गया है।

यह भारत के सभी नागरिकों के लिए 10 मौलिक कर्तव्यों की एक सूची प्रदान किया है। बाद में 86 वां संविधान संशोधन अधिनियम, 2002 के द्वारा भारतीय संविधान में एक और मूल कर्तव्य को जोड़ा गया। अधिकार लोगों को गारंटी के रूप में दिए जाते हैं।जबकि कर्तव्य ऐसे दायित्व हैं, जिन्हें पूरा करने की अपेक्षा प्रत्येक नागरिकों से जाती है।

हालांकि राज्य के नीति निर्देशक सिद्धांतों की तरह मौलिक कर्तव्य भी प्रकृति में न्यायोचित है। नीति निर्देशक सिद्धांत का उलंघन या अनुपालन न होने पर किसी प्रकार की कोई कानूनी कार्रवाई नहीं हो सकती है। भारतीय संविधान में वर्तमान में 11 मौलिक कर्तव्यों का उल्लेख किया गया है।

भारतीय संविधान में वर्णित 11 मौलिक कर्तव्य

(1). समस्त भारतीय नागरिकों को संविधान का आदर सम्मान करना होगा एवं साथ ही उसको सर्वमान्य मानकर उसका पालन करना होगा। तिरंगा व राष्ट्रगान का आदर- सम्मान करना होगा।

(2).जिन महापुरुषों ने हमें आजादी दिलाई एवं भारतीय स्वतंत्रता संग्राम में जिन्होंने अपना बलिदान दिया है, उनका आदर व सम्मान करना ।

(3). राष्ट्र की एकता, अखंडता एवं संप्रभुता की रक्षा करना और उसका आदर एवं गौरवपूर्ण सम्मान करना।

(4). राष्ट्र की विचारधारा और राष्ट्र के आदर्श मूल्यों की रक्षा करना।

(5) भारतीय संस्कृति का संरक्षण कर उसे बढ़ावा देना।

(6). नागरिकों को एक समान आदर एवं सम्मान देना तथा उनके अधिकारों का सम्मान करना।

(7). प्राकृतिक संपदा का संरक्षण करना एवं इसकी वृद्धि के लिए प्रयत्न करना।

(8). वैज्ञानिक मानदंडों को अपनाना एवं राष्ट्र के विकास के लिए ज्ञान के क्षेत्र में वृद्धि करना।

(9). सार्वजनिक संपत्ति की संरक्षण करना एवं उसे हानि नहीं पहुंचाना।

(10). राष्ट्र के विकास हेतु सामाजिक कार्यों में अपना योगदान देना।

(11). माता-पिता द्वारा अपने बच्चों को प्राथमिक निःशुल्क शिक्षा प्रदान करवाना।

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(12) भारतीय धर्मनिरपेक्षता

भारतीय संविधान एक धर्मनिरपेक्ष संविधान है। इसलिए यह भारतीय राज्य के आधिकारिक धर्म के रूप में किसी भी विशेष धर्म का समर्थन नहीं करता है।

भारत के संविधान द्वारा वर्णित एक धर्मनिरपेक्ष लोकतंत्र की निम्नलिखित विशेषताएं हैं:- 

• राज्य स्वयं को किसी भी धर्म के साथ नहीं जोड़ेगा या उसके द्वारा नियंत्रित नहीं होगा,

• जबकि राज्य हर किसी को किसी भी धर्म का पालन करने या अपने की अधिकार की गारंटी देता है।

• भारतीय संविधान द्वारा यह भी अधिकार दिया गया है, कि यदि कोई व्यक्ति चाहे तो नास्तिक भी हो सकता है।

• राज्य द्वारा किसी भी व्यक्ति के खिलाफ उसके धर्म या आस्था के आधार पर किसी प्रकार का भेदभाव नहीं किया जाएगा।

• किसी भी सामान्य शर्त के अधीन राज्य के किसी भी कार्यालय में प्रवेश करने का प्रत्येक नागरिक का अधिकार अन्य नागरिकों के समान ही होगा। राजनीतिक समानता किसी भी भारतीय नागरिक को सर्वोच्च पद पाने का अधिकार प्रदान करती है।

इस अवधारणा का उद्देश्य एक धर्मनिरपेक्ष राज्य  स्थापित करना है। इसका मतलब यह नहीं है कि भारत राज्य धर्म का विरोधी है। धर्मनिरपेक्षता की पश्चिमी अवधारणा धर्म और राज्य के बीच पूर्ण अलगाव (धर्मनिरपेक्षता की नकारात्मक अवधारणा) को दर्शाती है ।

लेकिन भारत के संविधान में धर्मनिरपेक्षता की सकारात्मक अवधारणा को अपनाया गया है। यानी भारतीय संविधान में सभी धर्म को समान रूप से सम्मान देना या सभी धर्म को समान रूप से रक्षा करना है ।

इसके अतिरिक्त भारतीय संविधान में सांप्रदायिक प्रतिनिधित्व की पुरानी व्यवस्था को भी समाप्त कर चुका है। हालांकि यह अनुसूचित जातियों एवं अनुसूचित जनजातियों के लिए पर्याप्त प्रतिनिधित्व सुनिश्चित करने हेतु सीटों के अस्थाई आरक्षण का प्रावधान किया गया है।

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(13). सार्वभौमिक वयस्क मताधिकार 

भारतीय लोकतंत्र में एक व्यक्ति एक मत के आधार पर कार्य किया जाता है। भारत का प्रत्येक नागरिक जिसकी आयु 18 वर्ष या इससे अधिक का है, जाति, लिंग ,धर्म, नस्ल या स्थिति के आधार पर बिना भेदभाव किये सभी को चुनाव में वोट देने का अधिकार प्राप्त है। भारत का संविधान सार्वभौमिक वयस्क मताधिकार की पद्धति के माध्यम से भारत में राजनीतिक समानता स्थापित करता है।

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(14). एकल नागरिकता

संघीय राज्य में आमतौर पर नागरिकों को दोहरी नागरिकता प्राप्त होता है। जैसा कि संयुक्त राज्य अमेरिका में है।

लेकिन भारतीय संविधान में केवल एक ही नागरिकता का प्रावधान किया गया है। इसका अर्थ यह है कि प्रत्येक भारतीय भारत का नागरिक है। चाहे उसका निवास स्थान या जन्म स्थान कुछ भी क्यों ना हो।

अगर कोई नागरिक किसी घटक राज्य जैसे कि बिहार, उत्तरांचल, उत्तर प्रदेश, झारखंड का नागरिक नहीं है। जिससे वह संबंधित हो सकता है ,लेकिन वह भारत का नागरिक बना रहता है।

भारत के सभी नागरिक देश में कहीं भी रोजगार प्राप्त करने का अधिकार रखते हैं एवं भारत के सभी हिस्सों में समान रूप से सभी अधिकारों का उपयोग भी कर सकते हैं ।

संविधान निर्माताओं के द्वारा जानबूझकर क्षेत्रवाद एवं अन्य बिघटनकारी प्रवृत्तियों को खत्म करने के लिए एकल नागरिकता के विकल्प को अपनाया गया था। एकल नागरिकता ने निःसंदेह भारत के लोगों में एकता की भावना उत्पन्न की है।

(15). स्वतंत्र निकाय

भारत का संविधान न केवल सरकार के विधायी कार्यकारी और न्यायिक अंगों को सुरक्षा प्रदान करता है। बल्कि कुछ स्वतंत्र निकायों की स्थापना भी करता है। इस स्वतंत्र निकायों को संविधान द्वारा भारत में सरकार की लोकतांत्रिक प्रणाली के लिए सेतु के रूप में परिकल्पित किया गया है।

(16). आपातकालीन प्रावधान

संविधान निर्माताओं के द्वारा यह अनुमान लगाया गया था ,कि देश में कभी-कभी ऐसी परिस्थितियो उत्पन्न हो सकती हैं ।जब सरकार को सामान्य रूप से काम चलाने में असहजता होगी। इसलिए ऐसी परिस्थितियों से निपटने के लिए भारतीय संविधान में आपातकालीन प्रावधानों किया गया।

आपातकालीन प्रावधान तीन प्रकार का होता है:-

✓युद्ध, बाहरी आक्रमण या सशस्त्र विद्रोह के करण आपातकाल( अनुच्छेद 352)

✓राज्यों में संवैधानिक तंत्र के विफलता से उत्पन्न आपातकाल (अनुच्छेद 356 और अनुच्छेद 365)

✓वित्तीय आपातकाल (अनुच्छेद 360)

इन तीनों प्रावधानों को शामिल करने के पीछे तर्कसंगत्ता देश की संप्रभुता, एकता ,अखंडता एवं सुरक्षा लोकतांत्रिक राजनीतिक व्यवस्था तथा संविधान की संरक्षण करना है ।

आपातकाल के दौरान केंद्र सरकार सर्वशक्तिशाली हो जाती है एवं राज्य की शक्तियां केंद्र के पूर्ण नियंत्रण में आ जाती है।संघीय से एकात्मक स्वरूप धारण कर लेता है।

विषम परिस्थितियों में भारत के राजनीतिक व्यवस्था का संघात्मक से एकात्मक में परिवर्तन एक अनूठी विशेषता है।

(17).त्रिस्तरीय सरकार 

मूल रूप से भारतीय संविधान में दोहरी राजव्यवस्था प्रदान की गई थी।लेकिन 73वां एवं 74वां संवैधानिक संशोधन अधिनियम, 1992 के तहत एक तीसरा स्तर स्थानीय सरकार को शामिल किया गया है,जो दुनिया के किसी भी अन्य संविधान में नहीं पाया जाता है।

1992 के 73वां संविधान संशोधन के माध्यम से संविधान में एक नया भाग- 9 और एक नई अनुसूची 11 जोड़कर पंचायत को अर्थात स्थानीय सरकार को संवैधानिक मान्यता प्रदान की गई है।

इसी प्रकार 74 वां संविधान संशोधन अधिनियम 1992 के माध्यम से भारतीय संविधान में एक नया भाग 9 (क) और एक नई अनुसूची 12 जोड़कर नगर पालिकाओं अर्थात शहरी स्थानीय सरकार को भी संवैधानिक मान्यता प्रदान की गई है।

(18) सहकारी समितियां

97 वां संविधान संशोधन अधिनियम 2011 के द्वारा सहकारी समितियां को संवैधानिक दर्जा प्रदान किया गया है।

इस संदर्भ में भारतीय संविधान में निम्नलिखित तीन परिवर्तन किए गए हैं:-

• इस संविधान संशोधन के द्वारा सहकारी समितियां के गठन के अधिकार को मौलिक अधिकार बना दिया गया (अनुच्छेद 19)

• इसमें सहकारी समितियां के प्रचार पर राज्य नीति के एक नए निदेशक सिद्धांत अनुच्छेद 43 भी शामिल किया गया था।

• संविधान में एक नया भाग- 9 भी जोड़ा गया, जिसका शीर्षक है “सहकारी समितियां” (अनुच्छेद 243 ZH से 243 ZT)।

सहकारी समितियां लोकतांत्रिक पेशेवर स्वत: एवं आर्थिक रूप से सुदृढ़ तरीका से कार्य कर सके, यह सुनिश्चित करने के लिए भारतीय संविधान के नए भाग 9 (B) में विभिन्न प्रावधान किए गए हैं।

यह बहु राज्य सहकारी समितियों के संबंध में संसद एवं अन्य सहकारी समितियां के संबंध में राज्य विधानसभाओं को भी उपयुक्त कानून बनाने का अधिकार प्रदान करता है।

भारतीय संविधान का दर्शन

संविधान सभा में 22 जनवरी 1947 को जवाहरलाल नेहरू द्वारा तैयार किए गए उद्देश्य प्रस्ताव को संविधान निर्माता द्वारा अपनाया गया था।

उद्देश्य संकल्प में संविधान के मौलिक प्रस्ताव शामिल किए गए थे एवं राजनीतिक विचारों को भी निर्धारित किया गया था, जो कि इसके विचार- विमर्श का मार्गदर्शन करते हैं।

उद्देश्य संकल्प के मुख्य सिद्धांत निम्नलिखित थे:-

• भारत को एक स्वतंत्र एवं संप्रभु गणराज्य बनाना है।

• सभी घटक भागों में समान स्तर के स्वशासन के साथ एक लोकतांत्रिक संघ की स्थापना हो।

• संघ सरकार और घातक भागों की सरकारों की सारी शक्ति एवं अधिकार भारत के लोगों से प्राप्त होते हैं।

• भारतीय संविधान को सामाजिक, आर्थिक एवं राजनीतिक समानता, अवसर और कानून के समक्ष समानता के आधार पर लोगों को न्याय प्राप्त करने एवं गारंटी देने का प्रयास करना चाहिए।

• सभी को अभिव्यक्ति, विश्वास, पूजा, व्यवसाय एवं काम की स्वतंत्रता प्रदान करनी चाहिए।

• संविधान को अल्पसंख्यकों एवं पिछड़े तथा आदिवासी क्षेत्र के लोगों आदि के लिए भी उचित अधिकार प्रदान करना चाहिए।

• ताकि वह भी सामाजिक, आर्थिक एवं राजनीतिक न्याय के साथ समान रूप से भागीदार बन सकें।

• एक ऐसा संविधान तैयार करना जो भारत के लिए राष्ट्रों के समुदाय में उचित स्थान को सुनिश्चित करे।

• भारतीय संविधान के दर्शन में हुए आदर्श शामिल है, जिन पर हमारे देश का संविधान खड़ा है, और भी नीतियां जिनका पालन करने के लिए संविधान समुदाय के शासकों को आदेश देता है।

भारतीय संविधान निम्नलिखित क्षेत्रों में हमारी विचारधारा के प्रभाव को प्रदर्शित करता है:-

धर्मनिरपेक्षता:- धर्मनिरपेक्षता भारतीय संविधान की महत्वपूर्ण पहचान है। भारत में विभिन्न धर्मों को मानने वाले लोगों को अपनी-अपनी पसंद की धार्मिक उपासना करने की स्वतंत्रता प्रदान की गई है।

यहां पर सभी धर्म को एक समान दृष्टि से देखा जाता है। भारत में जिस तथ्य की सराहना की गई है, वह यह है कि सभी धर्म मानवता से प्रेम करते हैं।

आधुनिक भारत के सभी समाज सुधारकों एवं राजनीतिक नेताओं ने भी धार्मिक सहिष्णुता धार्मिक स्वतंत्रता एवं सभी धर्म के लिए समान रूप से सम्मान करने की वकालत की गई थी।

इसी सिद्धांत को भारतीय संविधान में भी अपनाया गया है। जहां सभी धर्म को समान रूप से मान सम्मान दिया जाता है।

हालांकि वर्ष 1949 में अपनाए गए भारतीय संविधान में धर्मनिरपेक्षता शब्द का कहीं पर भी उल्लेख नहीं किया गया था। इस शब्द को 42वें संविधान संशोधन अधिनियम ,1976 के माध्यम से भारतीय संविधान की प्रस्तावना में शामिल किया गया है।

• लोकतंत्र:– भारत के संविधान में लोकतंत्र का आधुनिक रूप पश्चिम से ग्रहण किया गया है। इस प्रणाली के तहत लोकतंत्र का अर्थ है कि लोगों के पास जाने के लिए सरकार की आवधिक जिम्मेदारियां है।इस काम के लिए लोगों द्वारा सरकार चुनने के लिए हर पांच वर्ष में चुनाव किए जाते रहेंगे।

हालांकि लोकतंत्र जीवन के आर्थिक एवं सामाजिक पहलुओं को भी शामिल करता है। लोकतंत्र का यह पहलू राजनीति के निर्देशक सिद्धांतों में अच्छी तरह से स्पष्ट होता है। इसमें मानव कल्याण, सहयोग, अंतरराष्ट्रीय भाईचारे आदि के उद्देश्य सम्मिलित हैं।

• सर्वोदय:- सर्वोदय का तात्पर्य सभी व्यक्ति के कल्याण से हैं। इसका मतलब सिर्फ बहुमत या बहुसंख्यक कल्याण करना ही नहीं है। यह बिना किसी अपवाद के सभी के कल्याण की बात करते हैं।

इसे राम राज्य के नाम से भी जाना जाता है। सर्वोदय की अवधारणा महात्मा गांधी, आचार्य विनोबा भावे एवं जयप्रकाश नारायण जी के द्वारा विकसित की गई थी।

जिसके तहत सभी का भौतिक, आध्यात्मिक, नैतिक और मानसिक विकास करने की कोशिश की जाती है। भारत के संविधान की प्रस्तावना एवं राज्य के नीति निर्देशक सिद्धांत के द्वारा इसे प्रदर्शित किया जाता है।

समाजवाद:-भारत के लिए समाजवाद कोई नया नहीं है। वेदांत के दर्शन में भी समाजवाद का उल्लेख किया गया है। स्वतंत्रता के लिए राष्ट्रीय संघर्ष का भी यही उद्देश्य था।

पंडित जवाहरलाल नेहरू ने खुद को समाजवादी एवं गणतंत्र वादी बताया करते थे। भारत में लगभग सभी दल लोकतांत्रिक समाजवाद को बढ़ावा देने का दावा करते हैं ।यह सिद्धांत राज्य के नीति- निर्देशक सिद्धांतों में शामिल किया गया है।

हालांकि इस पहलू पर जोर देने के लिए समाजवाद शब्द को विशेष रूप से भारतीय संविधान में 42 वां संविधान संशोधन अधिनियम, 1976 के माध्यम से प्रस्तावना में शामिल किया गया है।

मानवतावाद :- मानवतावाद भारतीय विचारधारा की एक महत्वपूर्ण विशेषता है। भारतीय विचारधारा संपूर्ण मानवता को एक बड़ा परिवार ( वसुधैव कुटुंबकम) के रूप में मानती है।

यह आपसे बातचीत के द्वारा अंतर्राष्ट्रीय विवादों को सुलझाने में विश्वास करता है। मानवतावाद को हम राज्य के नीति- निर्देशक सिद्धांतों में पाते हैं।

विकेंद्रीकरण:- सर्वोदय का दूसरा पहलू विकेंद्रीकरण होता है। भारत में हमेशा से ही पंचायत प्रणाली के माध्यम से विकेंद्रीकरण का प्रयास किया जाता रहा है। महात्मा गांधी जी के द्वारा भी विकेंद्रीकरण की वकालत की जाती थी।

इसी वजह से उन्हें एक दार्शनिक राजनेता भी माना जाता है। हमने विकेंद्रीकरण के उद्देश्य को प्राप्त करने के लिए भारत में पंचायती राज प्रणाली की शुरुआत की हुई है। राज्य के नीति निर्देशक सिद्धांतों में भी निर्धारित कुटीर उद्योगों की अवधारणा भी विकेंद्रीकरण को ही प्रदर्शित करता है।

उदारवाद:- भारतीय उदारवाद से उदारवाद की पश्चिमी अवधारणा को संदर्भित नहीं किया गया है। यह भारतीय संदर्भ में स्वशासन, राष्ट्रवाद, धर्मनिरपेक्षता, संवैधानिक दृष्टि को आर्थिक सुधारो एवं प्रतिनिधि संस्थाओं आदि को संदर्भित करता है। इन सभी अवधारणाओं की आधुनिक भारतीय नेताओं द्वारा वकालत किया गया था।

मिश्रित अर्थव्यवस्था:-मिश्रित अर्थव्यवस्था हमारी विचारधारा की एक प्रमुख विशेषता है। भारतीय अर्थव्यवस्था मिश्रित प्रणाली के माध्यम से प्रकट हुआ है।

मिश्रित अर्थव्यवस्था में सार्वजनिक और निजी दोनों क्षेत्र एक साथ मिलकर कार्य करते हैं। बड़े पैमाने पर एवं आवश्यक उद्योगों को सार्वजनिक क्षेत्र में शामिल किया गया है।

गांधीवाद :- गांधीवाद नैतिकता पर आधारित भारत का प्रतिनिधित्व करता है। महात्मा गांधी ने अहिंसा के माध्यम से विदेशी शासन से लड़ने का एक नया उदाहरण पेश किया हुआ था।

उन्होंने दुनिया को अहिंसा और सत्य के महत्व को अच्छे से समझाया। उनके द्वारा छुआछूत, कुटीर उद्योग, शराबबंदी, प्रौढ़ शिक्षा एवं गांव के उत्थान की वकालत की गई थी।

गांधी जी शोषण मुक्त और विकेंद्रीकृत समाज स्थापित करना चाहते थे इन सभी गांधीवादी सिद्धांतों को भारत के संविधान में सम्मानजनक रूप से स्थान मिला हुआ है।

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