Durga aarti |Durga ji ki aarti |शारदीय नवरात्रि में रोजाना करें मां अंबे की ये आरती, हर मनोकामना होगी पूरी

 Durga aarti :-  प्रत्येक वर्ष आश्विन माह के शुक्ल पक्ष की प्रतिपदा तिथि से शारदीय नवरात्रि आरंभ हो जाता है। इस वर्ष नवदुर्गा की उपासना का ये पावन पर्व 15 अक्टूबर से शुरू हो रहा है।

नवरात्रि के प्रथम दिन माता  के भक्तगणों के द्वारा कलश स्थापना किया जाता हैं।इस दिन भक्तगण मां दुर्गा का आह्वान करते हैं।

नवरात्रि के दौरान मां दुर्गा और उनके नौ स्वरूपों की आराधना की जाती है।  हिन्दू मान्यताओं के अनुसार इन नौ दिनों में मां अंबे की विधि-विधान से पूजा करने से विशेष फलों की प्राप्ति होती है।

नवरात्रि में मां दुर्गा को प्रसन्न करने के लिए विधि-विधान से पूजा-अर्चना के अलावा उनके प्रिय पकवानों का भी भोग लगाए जाते हैं, ताकि माता रानी प्रसन्न होकर हमारी सभी मनोकामनाओं को पूरा कर दें।

इसके अतिरिक्त प्रतिदिन पूजा के दौरान मां दुर्गा की आरती भी की जाती है। नवरात्रि के दौरान मां दुर्गा की कृपा प्राप्त करने के लिए प्रतिदिन मां दुर्गा की आरती अवश्य करना चाहिए। 

दुर्गा जी की आरती कैसे करनी चाहिए,जानिए पूरी विधि और जरुरी बातें

नवरात्रि के  दौरान प्रतिदिन सुबह-शाम मां दुर्गा की आरती करनी चाहिए। आरती करने से सभी तरह के पाप नष्ट हो जाते हैं। आरती में शामिल होने वालों को भी माता की कृपा प्राप्त होती है।

मां दुर्गा की आरती में कुछ जरुरी बातों का हमें हमेशा ध्यान रखना चाहिए। आरती करने से पहले मां दुर्गा के मंत्रों से तीन बार पुष्पांजलि देनी चाहिए। इसके पश्चात शंख, घड़ियाल, ढोल और नगाड़े आदि महावाद्यों से जय-जयकार करते हुए आरती करनी चाहिए।

इसके पश्चात घी या कपूर से विषम संख्या में (1,5,7,11,21,101) बत्तियाँ जलाकर आरती शुरू करना चाहिए। विषम संख्याओ में तीन बत्तियों का कभी भी प्रयोग न करें।

अधिकांशतः पांच बत्तियों से आरती की जाती है। इसे पंचप्रदीप भी कहा जाता है। कहीं-कहीं एक, सात या उससे भी अधिक बत्तियों से आरती की जाती है। कहीं कहीं पर कपूर से भी आरती की‌ जाती है।

पद्मपुराण के अनुसार ‘कुंकुम, अगर, कपूर, घृत और चन्दन की सात या पाँच बत्तियाँ बनाकर या दीपक की (रुई और घी की) बत्तियाँ बनाकर सात बत्तियों से शंख, घण्टा आदि बाजे बजाते हुए माता की आरती की जानी चाहिए।

आरती करते समय सबसे पहले देवि प्रतिमा के चरणों में चार बार आरती  के थाल घुमाएं, दो बार नाभि प्रदेश में, एक बार मुख मण्डल पर और सात बार समस्त अंगों पर घुमाइए ।इस प्रकार चौदह बार आरती घुमानी चाहिए।

Durga aarti

मां दुर्गा की आरती (Durga aarti)

जय अम्बे गौरी, मैया जय श्यामा गौरी।

तुमको निशिदिन ध्यावत, हरि ब्रह्मा शिवरी॥

जय अम्बे गौरी

माँग सिन्दूर विराजत, टीको मृगमद को।

उज्जवल से दोउ नैना, चन्द्रवदन नीको॥

जय अम्बे गौरी

कनक समान कलेवर, रक्ताम्बर राजै।

रक्तपुष्प गल माला, कण्ठन पर साजै॥

जय अम्बे गौरी

केहरि वाहन राजत, खड्ग खप्परधारी।

सुर-नर-मुनि-जन सेवत, तिनके दुखहारी॥

जय अम्बे गौरी

कानन कुण्डल शोभित, नासाग्रे मोती।

कोटिक चन्द्र दिवाकर, सम राजत ज्योति॥

जय अम्बे गौरी

शुम्भ-निशुम्भ बिदारे, महिषासुर घाती।

धूम्र विलोचन नैना, निशिदिन मदमाती॥

जय अम्बे गौरी

चण्ड-मुण्ड संहारे, शोणित बीज हरे।

मधु-कैटभ दोउ मारे, सुर भयहीन करे॥

जय अम्बे गौरी

ब्रहमाणी रुद्राणी तुम कमला रानी।

आगम-निगम-बखानी, तुम शिव पटरानी॥

जय अम्बे गौरी

चौंसठ योगिनी मंगल गावत, नृत्य करत भैरूँ।

बाजत ताल मृदंगा, अरु बाजत डमरु॥

जय अम्बे गौरी

तुम ही जग की माता, तुम ही हो भरता।

भक्तन की दु:ख हरता, सुख सम्पत्ति करता॥

जय अम्बे गौरी

भुजा चार अति शोभित, वर-मुद्रा धारी।

मनवान्छित फल पावत, सेवत नर-नारी॥

जय अम्बे गौरी

कन्चन थाल विराजत, अगर कपूर बाती।

श्रीमालकेतु में राजत, कोटि रतन ज्योति॥

जय अम्बे गौरी

श्री अम्बेजी की आरती, जो कोई नर गावै।

कहत शिवानन्द स्वामी, सुख सम्पत्ति पावै॥

जय अम्बे गौरी

मां दुर्गा की आरती शंख, घंटा और ताली बजाते हुए करना चाहिए।

आरती की थाली को मां दुर्गा के सामने ऊपर से नीचे की तरफ गोलाकार घुमाएं।अर्थात ,आरती की थाल को घड़ी की सूई की दिशा में घुमाना चाहिए। इस क्रम में यदि ओम् की आकृति बनाई जाए ,तो और भी अच्छा होता है।

आरती संपन्न हो जाने के पश्चात आरती के ज्योत के ऊपर अपने दोनों हथेलियों को कुछ क्षण रखकर अपने माथे, कान आंख और मुंख पर रखना चाहिए।

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अंत तक पढ़ने के लिए धन्यवाद। 💐💐

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