Durga puja par nibandh:छात्रों और बच्चों के लिए दुर्गा पूजा पर निबंध

Durga puja par nibandh:- दूर्गा पूजा भारत के प्रसिद्ध त्योहारों में से एक है। मां दुर्गा के भक्तों के द्वारा बहुत ही धूमधाम और श्रद्धा पूर्वक मनाया जाता है। दूर्गा पूजा के दौरान बच्चों से लेकर बुढ़े तक सभी में हर्षोल्लास देखने को मिलता है।

दुर्गा पूजा, देवी माँ के द्वारा राक्षस महिषासुर पर विजय प्राप्त करने के उपलक्ष्य में मनाया जाता है।यह पूजा दुर्गा की जीत का एक हिंदू त्योहार है। यह पर्व ब्रह्मांड में नारी शक्ति को ‘शक्ति’ के रूप में दर्शाता है।

यह बुराई पर अच्छाई कि जित का भी त्योहार है।यह‌ त्योहार हिंदुओं के लिए एक त्योहार होने के अलावे, यह परिवार और दोस्तों के पुनर्मिलन और सांस्कृतिक मूल्यों और रीति-रिवाजों के समारोह का भी समय है।इस समय सभी एक दूसरे से मिल कर खुशियां मनाते हैं 

दुर्गा पूजा का महत्व 

यह त्योहार 10 दिनों तक चलता है।इस दौरान माता के भक्तगणों के द्वारा 9 दिनों का व्रत रखा जाता है।भक्त गण उपवास और भक्ति का पालन करते हैं।

इस त्योहार के अंतिम चार दिनों अर्थात् सप्तमी, अष्टमी, नवमी और विजया-दशमी भारत में, विशेषकर बंगाल और विदेशों में बहुत चमक और भव्यता के साथ मनाए जाते हैं।इस समय वातावरण में एक अलग ही सकारात्मक ऊर्जा की अनुभूति होती है।

दुर्गा पूजा समारोह स्थान, रीति-रिवाजों और मान्यताओं के आधार पर भिन्न-भिन्न होते हैं।  इतने भिन्न-भिन्न होते हैं कि कहीं पर यह उत्सव केवल पांच दिनों का ही होता है, तो‌ कहीं यह सात दिनों का होता है, और कहीं पर यह पूरे दस दिनों का होता है। उल्लास ‘षष्ठी’ – छठे दिन से शुरू होकर  ‘विजयदशमी’ – दसवें दिन तक रहता है।

दुर्गा पूजा की पृष्ठभूमि

 हिन्दू ,मान्यताओं के अनुसार देवी दुर्गा हिमालय और मेनका की बेटी थीं। बाद में उनका‌ विवाह भगवान शिव के साथ संपन्न हुआ। एक मान्यता यह है कि दुर्गा पूजा का त्योहार तब से शुरू हुआ जब भगवान राम ने रावण पर विजय प्राप्त करने हेतु शक्तियां प्राप्त करने के लिए  देवी की पूजा की थी।

कुछ समुदायों, विशेषकर बंगाल में, निकटवर्ती क्षेत्रों में ‘पंडाल’ सजाकर इस त्यौहार को बहुत ही हर्शोल्लास के साथ मनाया जाता है। कुछ लोग घर पर भी पूरी व्यवस्था करके देवी दुर्गा की पूजा करते हैं। अंतिम दिनों में, वे देवी की मूर्ति को पवित्र नदी गंगा में  विसर्जित कर देते हैं।

हम सभी बुराई पर अच्छाई की जीत या अंधेरे पर प्रकाश की जीत का सम्मान करने के लिए दुर्गा पूजा मनाते हैं । कुछ लोगों का कहना है कि इस त्योहार के पीछे एक और कहानी यह है कि इस दिन मां दुर्गा ने राक्षस महिषासुर को मारकर अपने भक्तों को महिषासुर के भय से मुक्त किया था।

महिषासुर राक्षस को खत्म करने और दुनिया को उसकी क्रूरता से बचाने के लिए त्रिदेवों – शिव, ब्रह्मा और विष्णु ने माता का आवाहन किया था। माता भगवती और महिषासुर राक्षस के बीच दस दिनों तक युद्ध चला और अंत में, दसवें दिन, देवी दुर्गा ने राक्षस को मारकर अपने भक्तों को भय मुक्त कर दिया। इसीलिए दसवें दिन को हम दशहरा या विजयादशमी के रूप में मनाते हैं।

दुर्गा पूजा के दौरान किये जाने वाले अनुष्ठान

 यह उत्सव महालया के समय से शुरू होते हैं, जहां भक्तों के द्वारा देवी दुर्गा से पृथ्वी पर आने का अनुरोध किया जाता हैं। इस दिन, वे चोक्खू दान नामक एक शुभ समारोह के दौरान देवी की मूर्ति पर अपनी नजर डालते हैं।इस दिन जगह-जगह देवी दुर्गा की मूर्ति को  स्थापित किया जाता है। सप्तमी को मूर्तियों में उनकी धन्य उपस्थिति को बढ़ाने के लिए अनुष्ठान किया जाता हैं।

यह अनुष्ठान  ‘प्राण प्रतिष्ठा’ कहलाता है। इसमें एक छोटा केले का पौधा होता है।इसे कोला बौ (केला दुल्हन) कहा जाता है।इस पौधे को पास की नदी या झील में स्नान के लिए ले जाया जाता है। स्नान के पश्चात साड़ी पहनाई जाती है, और इसे देवी की पवित्र ऊर्जा को ले जाने के तरीके के रूप में उपयोग किया जाता है।

 इस त्योहार के दौरान, भक्तों के द्वारा देवी की पूजा-अर्चना की जाती है।इस दौरान माता के नौ अलग-अलग रूपों में उनकी पूजा की जाती हैं। आठवें दिन शाम की आरती की रस्म के बाद धार्मिक लोक नृत्य की परंपरा है ,जो माता को प्रसन्न करने के लिए उनके सामने किया जाता है।

यह नृत्य जलते हुए नारियल के आवरण और कपूर से भरे मिट्टी के बर्तन को पकड़कर ड्रम की संगीतमय धुन पर  भक्तों के द्वारा किया जाता है।

नौवें दिन महाआरती के साथ यह पूजा संपन्न हो जाती है।यह प्रमुख अनुष्ठानों और प्रार्थनाओं की समाप्ति का प्रतीक है। इस त्योहार के अंतिम दिन, देवी दुर्गा अपने पति के घर वापस चली जाती हैं। देवी दुर्गा की प्रतिमाओं को नदी में विसर्जन के लिए ले जाया जाता है। विवाहित महिलाओं के द्वारा देवी को लाल सिन्दूर का चूर्ण चढ़ाई जाती हैं और इस चूर्ण से स्वयं को चिन्हित करती हैं।

Durga puja par nibandh

नवरात्रि में इन चीजों का लगाए जाते हैं भोग

मां दुर्गा को शक्ति का प्रतीक और स्वरूप भी माना जाता है। हिंदू धार्मिक मान्यताओं के अनुसार नवरात्रि के दिनों में मां दुर्गा को खीर, फल और मिठे का भोग लगाए जाने की‌ परंपरा है। ऐसी मान्यता है कि इन चीजों का भोग लगाकर पूजा करने से जीवन कई कई बाधाएं खत्म हो जाती है।साथ ही इन दिनों में अखंड ज्योति भी जलाने की परंपरा है।

निष्कर्ष

 हमारे देश में सभी लोग अपनी जाति और आर्थिक स्थिति की परवाह किए बिना इस त्योहार को मनाते हैं, और इसका  भरपूर आनंद लेते हैं। दुर्गा पूजा एक अत्यंत सामुदायिक और नाटकीय त्योहार है।

नृत्य और सांस्कृतिक प्रदर्शन इस पर्व का एक महत्वपूर्ण हिस्सा है। स्वादिष्ट पारंपरिक भोजन भी इस त्योहार का एक बड़ा हिस्सा है। कोलकाता की सड़कें, खाद्य स्टालों और दुकानों से भरी हुई हैं, जहां कई स्थानीय और विदेशी लोगों के द्वारा मिठाइयों सहित मुंह में पानी लाने वाले खाद्य पदार्थों का आनंद उठाएं जाते हैं।

दुर्गा पूजा मनाने के लिए पश्चिम बंगाल में सभी कार्यस्थल, शैक्षणिक संस्थान और व्यावसायिक स्थान बंद कर दिए जाते हैं।

यह त्योहार कोलकाता के अलावे, पटना, गुवाहाटी, मुंबई, जमशेदपुर, भुवनेश्वर आदि स्थानों पर भी मनाई जाती है। कई गैर-आवासीय बंगाली सांस्कृतिक प्रतिष्ठान यूके, यूएसए, ऑस्ट्रेलिया, फ्रांस और अन्य देशों में भी दुर्गा पूजा का आयोजन किया जाता है।

इस प्रकार से यह कहा जा सकता है कि दूर्गा पूजा भारत के सभी हिस्सों में तो हर्शोल्लास के साथ मनाया जाता ही है ,साथ ही कई विदेशों में भी मनाए जाते हैं।इस त्योहार से हमें यह सिखने को मिलता है कि अच्छाई की हमेशा बुराई पर जीत होती ही है।इसलिए हमें हमेशा सही रास्ते पर ही चलना चाहिए।हो सकता है कि शुरुआत में थोड़ी सी कठिनाइयों का सामना करना पड़े परंतु अंत में विजय की प्राप्ति हो ही जाती है।

उम्मीद है कि यह पोस्ट आपको पसंद आई होगी। ऐसे ही और जानकारियां हासिल करने के लिए इस वेबसाइट के साथ हमेशा बने रहे।

अंत तक पढ़ने के लिए धन्यवाद।💐💐

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