Maulik adhikar| Fundamental Rights in Hindi|मौलिक अधिकार के बारे में विस्तार से जानें

दोस्तों , इस पोस्ट में Maulik adhikar| Fundamental Rights in hindi  के बारे में विस्तार से वर्णन किया गया हैं। यदि आप मौलिक अधिकार के बारे में विस्तार से जाना चाहते हैं तो आप इस पोस्ट को शुरू से लेकर अंत तक अवश्य पढ़ें।

 इस पोस्ट में Fundamental rights in hindi पर विस्तृत विवरण दिया गया है। हमारे देश के संविधान में मौलिक अधिकार अमेरिका के संविधान से लिया गया है। संविधान के भाग 3 में अनुच्छेद 12 से 35 तक मौलिक अधिकारों का प्रावधान किया गया है।

Table of Contents

यह मानवाधिकार भारत के नागरिकों को प्रदत है, क्योंकि संविधान बताता है कि मौलिक अधिकार अनुल्लंघनीय है। जीवन का अधिकार, गरिमा का अधिकार, शिक्षा का अधिकार आदि यह सभी 6 मुख्य मौलिक अधिकार हैं।

तो आइए जानते हैं क्योंकि Fundamental Rights in Hindi में आपको इसके बारे में विस्तृत जानकारी प्राप्त होने वाली है।

इस पोस्ट में भारतीय संविधान के 6 मौलिक अधिकारों के बारे में वर्णन किया गया है:-

✓समानता का अधिकार

✓स्वतंत्रता का अधिकार

✓शोषण के विरुद्ध अधिकार

✓धार्मिक स्वतंत्रता का अधिकार

✓सांस्कृतिक और शैक्षिक अधिकार

✓संवैधानिक उपचारों का अधिकार

मौलिक अधिकार क्या हैं?

मौलिक अधिकार भारतीय संविधान में निहित बुनियादी मानवाधिकार है, जिनकी गारंटी सभी नागरिकों को दी गई है। मौलिक अधिकारों के बारे में प्रावधान किया गया है कि उल्लंघन होने पर सीधे सर्वोच्च न्यायालय में अपील किया जा सकता है।

इन्हें धर्म, जाति, लिंग आदि के आधार पर बिना किसी प्रकार के भेदभाव के लागू किया जाता है। ध्यान देने योग्य है कि मौलिक अधिकार कुछ शर्तों के अधीन अदालतों द्वारा लागू किया जा सकते हैं।

इन्हें मौलिक अधिकार क्यों कहा जाता है?

संविधान में निहित अधिकारों को दो कर्म से मौलिक अधिकार कहा जाता है जो निम्नलिखित है:-

✓ वे संविधान में निहित हैं जो उन्हें गारंटी देता है उल्लंघन होने पर पीड़ित व्यक्ति सीधे सर्वोच्च न्यायालय में जा सकता है।

✓वे न्याययोग्य (अदालतों द्वारा प्रवर्तनीय) हैं। 

भारतीय संविधान में कितने मौलिक अधिकार हैं? 

भारत के संविधान में 6 मौलिक अधिकारों का वर्णन किया गया है। इससे संबंधित संवैधानिक अनुच्छेदों का उल्लेख नीचे दिया गया है:-

(1).समानता का अधिकार (अनुच्छेद 14-18)

(2).स्वतंत्रता का अधिकार (अनुच्छेद 19-22)

(3).शोषण के विरुद्ध अधिकार (अनुच्छेद 23-24)

(4)धार्मिक स्वतंत्रता का अधिकार (अनुच्छेद 25-28)

(5).सांस्कृतिक एवं शैक्षिक अधिकार (अनुच्छेद 29-30)

(6).संवैधानिक उपचारों का अधिकार (अनुच्छेद 32)

संपत्ति का अधिकार मौलिक अधिकार क्यों नहीं है?

हमारे देश के मूल संविधान में 7 मौलिक अधिकारों का प्रावधान किया गया था। परंतु 44 वां संविधान संशोधन के द्वारा संपत्ति के अधिकार को मौलिक अधिकार से हटाकर कानूनी अधिकार बना दिया गया।

ऐसा इसलिए किया गया क्योंकि यह अधिकार समाजवाद के लक्ष्य को प्राप्त करने और लोगों के बीच संपत्ति को न्याय संगत रूप से वितरित करने की दिशा में बाधा साबित हो रहा था।

नोट: संपत्ति का अधिकार अब एक कानूनी अधिकार है, मौलिक अधिकार नहीं। 

Fundamental rights in hindi

छह मौलिक अधिकारों का परिचय (अनुच्छेद 12 से 35)

इस खंड के अंतर्गत भारत के संविधान के मौलिक अधिकारों को सूचीबद्ध कर प्रत्येक का संक्षेप में वर्णन इस पोस्ट में किया गया है।

1. समानता का अधिकार (अनुच्छेद 14 – 18)

समानता का अधिकार भारत के संविधान के महत्वपूर्ण मौलिक अधिकारों में से एक है ,जो की धर्म, लिंग, जाति, नस्ल या जन्म स्थान के परवाह किए बिना सभी नागरिकों को समान अधिकारों की गारंटी देता है।

यह सरकार में समान रोजगार के अवसर को सुनिश्चित करवाता है, और जाति, धर्म आदि के आधार पर रोजगार के मामलों में राज्य के द्वारा भेदभाव के खिलाफ संरक्षण प्रदान करता है ।इस अधिकार में उपाधियों के साथ-साथ अस्पृश्यता का भी उन्मूलन करना शामिल किया गया है।

2. स्वतंत्रता का अधिकार (अनुच्छेद 19 – 22)

लोकतांत्रिक समाज में स्वतंत्रता का होना सबसे महत्वपूर्ण होता है। भारतीय संविधान नागरिकों को गारंटी देता है, की उसके अधिकारों का सर्वोच्च न्यायालय के द्वारा संरक्षण किया जाएगा।

स्वतंत्रता के अधिकार में कई और अधिकार शामिल किए गए हैं जैसे:-

✓अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता

✓बिना हथियार के एकत्र होने की स्वतंत्रता

✓संघ की स्वतंत्रता

✓किसी भी पेशे को अपनाने की स्वतंत्रता 

✓देश के किसी भी हिस्से में रहने की आजादी

इन अधिकारों में से कुछ अधिकार राज्य सुरक्षा, सार्वजनिक नैतिकता और शालीनता तथा विदेशों के साथ मैत्रीपूर्ण संबंध ऑन की कुछ शर्तों के अधीन है।

इसका अभिप्राय यह है कि राज्य को उन पर युक्ति युक्त प्रतिबंध लगाने का अधिकार दिया गया है। अर्थात,प्रतिकुल परिस्थितियों में राज्य के द्वारा मौलिक अधिकारों पर कुछ समय के लिए प्रतिबंध लगाए जा सकते हैं।

3. शोषण के विरुद्ध अधिकार (अनुच्छेद 23 – 24)

शोषण के विरुद्ध अधिकार का तात्पर्य यह है कि मानव तस्करी ,बेगार और अन्य प्रकार के जबरन श्रम करने पर रोक लगाया जा सकता है। इसका तात्पर्य कारखाने आदि में बच्चों के द्वारा काम करने पर भी प्रतिबंध लगाना है।

इस प्रावधान के तहत खतरनाक परिस्थितियों में 14 वर्ष से कम उम्र के बच्चों को रोजगार पर रखना प्रतिबंध किया गया है।

4. धार्मिक स्वतंत्रता का अधिकार (अनुच्छेद 25 – 28)

हमारे देश के संविधान में वर्णित यह अधिकार भारत के धर्मनिरपेक्ष स्वरूप को इंगित करता है ।इस भारत देश में सभी धर्म का समान रूप से सम्मान किया जाता है और समान संरक्षण भी प्रदान किया जाता है।

इसमें विवेक, व्यवसाय, आचरण और धर्म के प्रचार- प्रसार की स्वतंत्रता है ।राज्य की अपनी कोई भी आधिकारिक धर्म नहीं है। हमारे देश में प्रत्येक व्यक्ति को स्वतंत्र रूप से किसी भी धर्म को अपनाने,उसका प्रचार- प्रसार करने आदि की स्वतंत्रता है।

एक व्यक्ति को स्वतंत्र रूप से अपने विश्वास का पालन करने, धार्मिक और धार्मिक संस्थाओं की स्थापना कर उनका रखरखाव करना उनके धार्मिक स्वतंत्रता के अधिकार में शामिल है।

(5).सांस्कृतिक और शैक्षिक अधिकार (अनुच्छेद 29 – 30)

यह अधिकार धार्मिक, सांस्कृतिक और भाषाई अल्पसंख्यकों को उनकी विरासत और संस्कृति को संरक्षित करने की सुविधा प्रदान प्रदान करता है ।शैक्षिक अधिकार बिना किसी भेदभाव के सभी के लिए शिक्षा सुनिश्चित करने के लिए प्रावधान करता है।

6. संवैधानिक उपचारों का अधिकार (32-35)

हमारे देश में यदि किसी नागरिक के मौलिक अधिकारों का उल्लंघन होता है, तो संविधान में उसके उपचार के गारंटी दिया गया है। सरकार द्वारा किसी के भी अधिकारों का हनन या उन पर अंकुश नहीं लगाई जा सकती है ।

जब नागरिकों के अधिकारों का उल्लंघन होता है, तो उनके पास यह अधिकार है कि वह सीधे अदालत का दरवाजा खटखटा सके।

इस मामले में पीड़ित व्यक्ति सीधे सर्वोच्च न्यायालय में जा सकता है ।सर्वोच्च न्यायालय मौलिक अधिकारों को लागू करने के लिए रिट जारी कर सकता है।

मौलिक अधिकारों की विशेषताएं

(1) सामान्य कानूनी अधिकार और मौलिक अधिकारों में कुछ भिन्नताएं होती हैं। जैसे कि यदि किसी कानूनी अधिकार का उल्लंघन होता है, तो पीड़ित व्यक्ति पहले निचली अदालत में जाता है।

फिर उसके बाद ही सुप्रीम कोर्ट जा सकता है परंतु जब मौलिक अधिकारों का उल्लंघन होता है तो पीड़ित व्यक्ति निचली अदालत को दरकिनार करते हुए सीधे सुप्रीम कोर्ट में जा सकता है।

(2) हमारे भारत के संविधान में वर्णित कुछ मौलिक अधिकार सभी नागरिकों के लिए उपलब्ध हैं, जबकि बाकी सभी व्यक्तियों (नागरिकों और विदेशियों) के लिए हैं।

(3) जानकारी के लिए बता दूं कि मौलिक अधिकार पूर्ण अधिकार नहीं है ।इन पर युक्ति युक्त प्रतिबंध लगाए जा सकते हैं। इसका अर्थ यह है कि यह अधिकार राज्य सुरक्षा सार्वजनिक नैतिकता और शालीनता तथा विदेशी देशों के साथ मैत्रीपूर्ण संबंधों के शर्तों के अधीन है।

(4) मौलिक अधिकारों को शब्द के द्वारा संवैधानिक संशोधन के माध्यम से संशोधित किया जा सकता है। परंतु यह केवल तभी किया जा सकता है, जब संशोधन संविधान के मूल संरचना को परिवर्तित ना करता हो।

(5) राष्ट्रीय आपातकाल के समय भारतीय संविधान के मौलिक अधिकारों को निलंबित किया जा सकता है। परंतु अनुच्छेद 20 और 21 के तहत गारंटीकृत अधिकारों को कभी भी निलंबित नहीं किया जा सकता है।

(6) मौलिक अधिकारों के प्रयोग पर उस क्षेत्र में प्रतिबंध लगाया जा सकता है ,जहां पर मार्शल लॉ या सैन्य शासन लगाया गया हो।

भारतीय संविधान में मौलिक अधिकारों की सूची निम्नलिखित है जो केवल नागरिकों के लिए उपलब्ध हैं (विदेशियों के लिए नहीं):-

✓नल धर्म जाति लिंग या जन्म स्थान के आधार पर भेदभाव का निषेध (अनुच्छेद 15)

✓सार्वजनिक रोजगार के मामलों में अवसर की समानता (अनुच्छेद 16)

✓ स्वतंत्रता का संरक्षण:(अनुच्छेद 19)

• वाणी एवं अभिव्यक्ति

• संगठन

• विधानसभा

• आंदोलन

• निवास स्थान

• पेशा

✓अल्पसंख्यकों की संस्कृति, भाषा और लिपि का संरक्षण (अनुच्छेद 29)।

✓शैक्षणिक संस्थानों की स्थापना और प्रशासन करने का अल्पसंख्यकों का अधिकार (अनुच्छेद 30)।

मौलिक अधिकारों का महत्व

लोगों के लिए मौलिक अधिकार बहुत ही महत्वपूर्ण होता है, क्योंकि यह देश की रीढ़ की हड्डी के समान है। यह अधिकार लोगों के हितों की रक्षा करता है।

अनुच्छेद 13 के अनुसार मौलिक अधिकारों का उल्लंघन होने पर सभी कानून अमान्य हो जाएंगे। यहां पर न्यायिक समीक्षा का स्पष्ट प्रावधान किया गया है।

सर्वोच्च न्यायालय और उच्च न्यायालय किसी भी कानून को इस आधार पर गैर संवैधानिक घोषित कर सकते हैं, की यह मौलिक अधिकारों का उल्लंघन कर रहा है ।

अनुच्छेद 13 में न केवल कानून बल्कि अध्यादेशों, विनियमों ,आदेशों, अधिसूचनाओं आदि के बारे में भी बात किया गया है।

मौलिक अधिकारों में संशोधन

हमारे देश के संविधान में वर्णित मौलिक अधिकारों में किसी भी प्रकार का बदलाव करने के लिए संवैधानिक संशोधन की आवश्यकता पड़ती है ,जिसे संसद के दोनों सदनों द्वारा पारित किया जाना होता है ।संशोधन विधेयक को संसद के विशेष बहुमत से पारित होना चाहिए।

संविधान के अनुसार अनुच्छेद 13(2 )में बताया गया है, कि ऐसा कोई भी कानून नहीं बनाया जा सकता है ,जो  किसी मौलिक अधिकारों का उल्लंघन करता हो।

प्रश्न यह है कि क्या संवैधानिक संशोधन अधिनियम को कानून कहा जा सकता है या नहीं।

1965 के सजन के मामले में सुप्रीम कोर्ट के द्वारा कहा गया कि संसद के द्वारा मौलिक अधिकारों सहित संविधान के किसी भी भाग में संशोधन किया जा सकता है।

परंतु 1967 में सुप्रीम कोर्ट ने अपने द्वारा पहले कही गई बात को पलट दिया, जब गोलकनाथ है मामले के फैसले में उसने कहा कि मौलिक अधिकारों में संशोधन नहीं किया जा सकता है।

वर्ष 1973 में केशवानंद भारती मामले में एक ऐतिहासिक फैसला आया हुआ था ,जहां सुप्रीम कोर्ट के द्वारा कहा गया कि मौलिक अधिकारों सहित संविधान का कोई भी हिस्सा संसद की संशोधन शक्ति से परे नहीं है। परंतु “संविधान के मूल संरचना को किसी भी तरह से परिवर्तित नहीं किया जा सकता है।”

न्यायिक समीक्षा भारतीय कानून का वह आधार है, जिसके द्वारा न्यायपालिका संसद द्वारा पारित की गई किसी भी संशोधन को इस आधार पर रद्द कर सकती है कि यह संविधान के मूल संरचना को परिवर्तन करता है, या मूल संरचना के विपरीत है।

1981 में, सुप्रीम कोर्ट के द्वारा संरचना के सिद्धांत को दोहराया गया। इसमें 24 अप्रैल 1973 यानी की केशवानंद भारती मामले के फैसले की तारीख के रूप में एक सीमा रेखा खींची गई ।और कहा गया कि उस तारीख से पहले किए गए संविधान में किसी भी संशोधन की वैधता को फिर से खोलने के लिए इसे पूर्व व्यापी रूप से लागू नहीं किया जाना चाहिए।

पृथक्करण नियता का सिद्धांत 

यह एक ऐसा सिद्धांत है जो संविधान में निहित मौलिक अधिकारों की संरक्षण करता है। इस सिद्धांत को पृथक्करण के सिद्धांत के रूप में भी जाना जाता है।

इस सिद्धांत का उल्लेख अनुच्छेद 13 में किया गया है। इसके अनुसार संविधान के प्रारंभ होने से पहले भारत में लागू किए गए सभी कानून मौलिक अधिकारों के प्रावधानों के साथ और असंगतता की सीमा तक शून्य हो जाएंगे।

इसका अभिप्राय यह है कि कानून के केवल वह हिस्से जो की और संगत है शून्य माने जाएंगे ना की पूरी प्रतिमा। केवल वह प्रावधान जो मौलिक अधिकारों का उल्लंघन करता है उसे शून्य माना जाएगा।

ग्रहण का सिद्धांत

इस सिद्धांत में बताया गया है कि मौलिक अधिकारों का उल्लंघन करने वाला कोई भी कानून शुरू से ही शून्य नहीं है। बल्कि केवल गैर प्रवर्तनीय है अर्थात यह मृत नहीं ,बल्कि निष्क्रिय है।

इसका तात्पर्य यह हुआ कि जब भी उस मौलिक अधिकार ( जिसका कानून द्वारा उल्लंघन किया गया था) को खत्म कर दिया जाता है, तो कानून फिर से सक्रिय हो जाता है।

यहां ध्यान देने योग्य बात यह है कि ग्रहण का सिद्धांत केवल पूर्व संवैधानिक के कानून पर लागू होता है ,ना कि संवैधानिक कानून के बाद।

इसका मतलब यह हुआ कि कोई भी संवैधानिक कानून जो मौलिक अधिकार का उल्लंघन करता है वह शुरू से ही अमान्य है।

मौलिक अधिकार और कर्तव्य कैसे भिन्न हैं?

 हमारे संविधान में वर्णित मौलिक अधिकार इस देश के लोगों के लिए उपलब्ध अधिकार है, जबकि मौलिक कर्तव्य नागरिकों के दायित्व हैं ।

इंदिरा गांधी सरकार के द्वारा 42वें संविधान संशोधन अधिनियम 1976 द्वारा भारतीय संविधान में स्वर्ण सिंह समिति के सिफारिश पर मौलिक कर्तव्य को जोड़े गए हैं।

हमारे संविधान में वर्णित मौलिक अधिकार और कर्तव्य दो महत्वपूर्ण अवधारणाएं हैं। मौलिक अधिकार वे अधिकार है जो किसी व्यक्तियों को किसी विशेष देश के नागरिक होने के आधार पर प्राप्त होते हैं । जबकि मौलिक कर्तव्य एक जिम्मेदारियां हैं जो नागरिकों की अपने देश और साथी नागरिकों के प्रति होती है।

मौलिक कर्तव्य और मौलिक अधिकारों के बीच कुछ प्रमुख अंतर है:-
✓प्रकृति के आधार पर

मौलिक अधिकार वह कानूनी अधिकार है जो किसी देश के संविधान में निहित होता है ।यह मौलिक अधिकार व्यक्तियों के हितों की रक्षा करने और उन्हें सुरक्षा और समानता की भावना प्रदान करने में सहायक होता है।

दूसरी ओर मौलिक कर्तव्य नागरिकों से अपने देश और अपने साथी नागरिकों के प्रति अपेक्षित नैतिक और नैतिक दायित्व होता है।

प्रवर्तन के आधार पर

मौलिक अधिकार कानून की अदालतों के माध्यम से लागू कराए जा सकते हैं। यदि किसी व्यक्ति के मौलिक अधिकारों का उल्लंघन होता है ,तो वह पीड़ित व्यक्ति कानून  की सहायता ले सकता है।अदालतों के द्वारा पीड़ित व्यक्ति के लिए उचित कार्यवाही की जा सकती है ।

परंतु मौलिक कर्तव्यों को इस तरह से लागू नहीं किया जा सकता है ।हालांकि नागरिकों से अपने मौलिक कर्तव्यों को पूरा करने की अपेक्षा की जाती है ।लेकिन ऐसा करने में असफल होने पर किसी प्रकार का कोई कानूनी कार्रवाई नहीं की जा सकती है।

 ✓लक्ष्य के आधार पर 

मौलिक अधिकारों का ध्यान व्यक्तियों के हितों की रक्षा करने और उनकी भलाई सुनिश्चित करने पर होता है। जबकि दूसरी ओर मौलिक कर्तव्य सामूहिक भलाई को बढ़ावा देने पर। मौलिक कर्तव्य यह सुनिश्चित करने की कोशिश करता है कि नागरिक अपने देश के कल्याण में योगदान दे सकें।

दोस्तों, हमें अपने अधिकारों के बारे में जानकारी अवश्य होना चाहिए । यदि आप किसी गवर्नमेंट जॉब की तैयारी करते हैं तब तो और भी आपके लिए आवश्यक हो जाता है ,की आप मौलिक अधिकारों के बारे में जानकारी रखें।

मौलिक अधिकारों से संबंधित  प्रश्न

(1). मौलिक अधिकार क्या हैं?

भारत के संविधान में 7 मौलिक अधिकार थे परंतु वर्तमान में केवल 6 मौलिक अधिकार ही हैं क्योंकि “संपत्ति का अधिकार” को मौलिक अधिकार से हटाकर कानूनी अधिकार बना दिया गया।

मौलिक अधिकारों की सूची इस प्रकार है:-

(1).समानता का अधिकार,

(2).स्वतंत्रता का अधिकार

(3) शोषण के विरुद्ध अधिकार 

(4).धर्म की स्वतंत्रता का अधिकार,

(5) .सांस्कृतिक और शैक्षणिक अधिकार,

(6).संवैधानिक उपचारों का अधिकार,

(2) अनुच्छेद 51ए क्या है?

अनुच्छेद 51ए प्रत्येक भारतीय नागरिकों के लिए निर्धारित मौलिक कर्तव्यों की एक सूची  है।

(3).सबसे महत्वपूर्ण मौलिक अधिकार कौन सा है?

 हमारे संविधान में वर्णित मौलिक अधिकारों में से ‘संवैधानिक उपचारों ‘का अधिकार सबसे महत्वपूर्ण मौलिक अधिकार माना जाता है ।क्योंकि यह हमारे मौलिक अधिकारों का संरक्षण करता है।

दोस्तों उम्मीद है कि Fundamental Rights in Hindi पोस्ट आपको पसंद आई होगी। ऐसे ही और जानकारी हासिल करने के लिए इस वेबसाइट के साथ हमेशा बने रहें।

अंत तक पढ़ने के लिए धन्यवाद। 💐💐

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