Pradosh vrat Katha Dec 2023 in hindi : प्रदोष व्रत कथा, समस्त पापों को करती है दूर

दोस्तों, प्रदोष व्रत के दिन भगवान भोलेनाथ की पूजा अर्चना करने तथा प्रदोष व्रत कथा सुनने मात्र से जीवन के समस्त पाप नष्ट हो जाते हैं।भगवान भोलेनाथ की आशीर्वाद हमेशा बनी रहती है। इसलिए Pradosh vrat Katha Dec 2023 in hindi पोस्ट के माध्यम से यह वेबसाइट प्रदोष कथा का वर्णन कर रही है। प्रदोष व्रत के दिन इस कथा को अवश्य पढ़ें।

प्रदोष व्रत

दोस्तों,प्रत्येक महीने में दो त्रयोदशी तिथि आता है। इसी त्रयोदशी तिथि के दिन प्रदोष का व्रत किया जाता है। इस व्रत के दिन भगवान भोलेनाथ, माता पार्वती एवं प्रथम पूज्य गणेश भगवान जी की पूजा- अर्चना करने से व्यक्ति का जीवन सदा सुखमय रहता है।

इस व्रत को करने से सभी पाप कर्मों का नाश हो जाता है। इस व्रत के दिन सच्ची श्रद्धा एवं भक्ति भाव के साथ भगवान भोलेनाथ के विशेष आराधना की जाती है। ऐसा करने से साधक के ऊपर भगवान भोलेनाथ तथा माता पार्वती की भी विशेष कृपा दृष्टि हमेशा बनी रहती है।

व्रत के दिन भोलेनाथ की पूजा करने के साथ-साथ प्रदोष व्रत कथा का श्रवण अवश्य करना चाहिए। व्रत कथा को सुनने मात्र से साधक के जीवन के सभी पाप कर्मों का नाश हो जाता है। उत्तम पुण्य की प्राप्ति होती है, जिससे व्यक्ति का जीवन हमेशा खुशहाल बना रहता है।

प्रदोष व्रत कथा

प्राचीन काल के समय एक गरीब पुजारी रहा करता था। उस पुजारी की मृत्यु हो जाने के पश्चात उसकी विधवा पत्नी अपने भरण-पोषण के लिए पुत्रों को साथ लेकर भीख मांगने जाती तथा शाम में घर वापस आ जाया करती थी।

एक दिन उसकी मुलाकात विदर्भ देश के राजकुमार से हुई और राजकुमार को अपने साथ अपने घर लेकर आ गई। इस राजकुमार को पुजारी की विधवा स्त्री अपने पुत्र के समान ही अपने घर में रखने लगी तथा उसका भरण पोषण करने लगी।

एक दिन पुजारी की पत्नी अपने साथ दोनों पुत्रों को शांडिल्य ऋषि के आश्रम में लेकर गई। वहां पर उसने ऋषि शांडिल्य से शिव जी के प्रदोष व्रत की कथा एवं विधि के बारे में सुनी तथा घर जाकर अब वह भी प्रदोष व्रत करने लगी।

एक बार दोनों बालक वन में घूम रहे थे। उनमें से पुजारी का बेटा तो अपने घर लौट गया, परंतु राजकुमार वन में ही रह गया। उस राजकुमार ने गंधर्व कन्याओं को क्रीड़ा करते हुए देखा तो उनसे बात करना चाहा।

कुछ समय पश्चात एक कन्या से राजकुमार बात करने लगे।उस कन्या का नाम अंशुमती था। उस दिन वह राजकुमार घर कुछ देर से लौटा।

राजकुमार दूसरे दिन भी फिर से उसी जगह पहुंच गया जहां अंसुमति अपने माता-पिता से बात कर रही थी। तभी अंशुमती के माता-पिता ने उस राजकुमार को पहचान लिया एवं उससे कहा कि आप तो विदर्भ नगर के राजकुमार है ।

आपका नाम तो धर्मगुप्त होगा।अंशुमती के माता-पिता को वह राजकुमार बहुत पसंद आया और उन्होंने कहा कि शिव जी की कृपा से हम अपनी पुत्री का विवाह आपके साथ करना चाहते हैं। क्या आप भी इस विवाह से सहमत हैं?

राजकुमार ने भी अपनी स्वीकृति दे दी, तो उन दोनों का विवाह संपन्न हो गया। बाद में राजकुमार ने गंधर्व के विशाल सेवा के साथ विदर्भ पर हमला कर दिया और घमासान युद्ध कर विजय प्राप्त कर ली तथा अपनी पत्नी के साथ राज्य करने लगा ।

वहां उस महल में वह पुजारी की पत्नी तथा उसके पुत्र को भी अपने साथ ले आया तथा अपने साथ ही रखने लगा। पुजारी की पत्नी तथा उसके पुत्र के सभी दुख  दूर हो गई और वह अब सुख से अपना जीवन व्यतीत करने लग गए।

एक दिन अंशुमती ने राजकुमार से इन सभी बातों के पीछे का कारण और रहस्य के बारे में जानना चाहा, तो राजकुमार ने अंशुमाती को अपने जीवन की सारी बातें बताई तथा साथ ही प्रदोष व्रत का महत्व और व्रत से प्राप्त होने वाले फल से भी अवगत करा दिया।

उसी दिन से इस व्रत की प्रतिष्ठा व महत्व और भी बढ़ गया तथा मान्यता अनुसार लोग यह व्रत को करने लगे। कई जगहों पर अपनी श्रद्धा के अनुसार स्त्री-पुरुष दोनों ही इस व्रत को करते हैं।

कहा जाता है कि इस व्रत को करने से मनुष्य के सभी पाप कर्म नष्ट हो जाते हैं तथा मनुष्य को अभीष्ट की प्राप्ति होती है।

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अंत तक पढ़ने के लिए धन्यवाद।💐💐

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