sanvidhan ki visheshtaen : संविधान की चार विशेषताएं लिखिए

दोस्तों, भारत में सभी कानून व्यवस्थाएं संविधान के अनुसार संचालित की जाती है। हमारे देश का सर्वोच्च विधान संविधान ही है। संविधान के ऊपर कोई नहीं है। भारतीय संविधान का निर्माण विश्व के सभी संविधानों के निचोड़ने के पश्चात किया गया है। इसलिए इसके तत्व बड़े ही अनुठे हैं।आप sanvidhan ki visheshtaen पोस्ट को पढ़कर भारतीय संविधान के विशेषताओं के बारे में जानकारी प्राप्त कर सकते हैं।

भारतीय संविधान की विशेषताएं निम्नलिखित है:-

(1). संघात्मक और एकात्मकता का मिश्रण

भारतीय संविधान, सरकार की एक संघीय प्रणाली को स्थापित करता है। इसमें एक संघ की सभी सामान्य विशेषताओं को शामिल किया गया है।

भारतीय संविधान का अनुच्छेद 1 भारत को राज्यों के संघ के रूप में वर्णित करता है, जिसका तात्पर्य दो चीजों से है:-

(1) भारतीय संघ राज्यों के समझौते का परिणाम नहीं है।

(2). किसी भी राज्य को संघ से अलग होने का अधिकार नहीं है।

इसीलिए के.सी व्हेयर के द्वारा कहा गया है, कि भारत का संविधान का रूप संघीय है, लेकिन भावना में एकात्मक है। अर्थात भारतीय संविधान को अर्ध-संघीय के रूप में वर्णित किया गया है।

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(2). कानून का शासन

भारत के लोग कानून द्वारा शासित होते हैं, ना कि किसी व्यक्ति के द्वारा। अर्थात बुनियादी सत्यवाद है कि कोई भी व्यक्ति यहां कानून से ऊपर नहीं है। लोकतंत्र के लिए कानून व्यवस्था बेहद महत्वपूर्ण होता है।

इसका अधिक स्पष्ट अर्थ यह है कि लोकतंत्र में कानून ही सर्वोच्च विधान एवं संप्रभु होता है। अंतिम विश्लेषण में कानून के शासन का अर्थ यह हो सकता है, कि आम आदमी के सामूहिक ज्ञान ही संप्रभुता है।

(3). एकीकृत एवं स्वतंत्र न्यायपालिका की व्यवस्था

भारत में एकल न्यायपालिका प्रणाली की व्यवस्था की गई है। साथ ही भारतीय संविधान कार्यपालिका एवं विधायिका के प्रभाव से मुक्त होने के साथ-साथ भारतीय न्यायपालिका को सक्षम करके स्वतंत्र न्यायपालिका की स्थापना भी करता है।

सर्वोच्च न्यायालय न्यायिक प्रणाली के शीर्ष न्यायालय के रूप में भी काम करता है। सर्वोच्च न्यायालय के नीचे राज्य स्तर पर उच्च न्यायालय है। एक उच्च न्यायालय के तहत अधीनस्थ न्यायालय का एक पद अनुक्रम है, जो कि जिला अदालतों एवं अन्य निचली अदालतों के रूप में कार्य करते हैं।

सर्वोच्च न्यायालय को एक संघीय अदालत भी कहा जाता है। यह नागरिकों के मौलिक अधिकारों का गारंटी भी देता है। सर्वोच्च न्यायालय भारतीय संविधान का संरक्षक एवं भारत के लोगों के मूल अधिकारों का संरक्षक भी है।

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(4). मौलिक अधिकार

भारतीय संविधान के भाग 3 में सभी नागरिकों के लिए 6 मौलिक अधिकारों की गारंटी दिया गया है। मूल संविधान में 7 मूल अधिकार का प्रावधान किया गया था।

परंतु 44 वां संविधान संशोधन अधिनियम 1976 के द्वारा संपत्ति के अधिकार को मूल अधिकार से हटाकर कानूनी अधिकार बना दिया गया।

भारतीय संविधान में मौलिक अधिकार भारतीय संविधान की महत्वपूर्ण विशेषताओं में से एक है। संविधान में मूल सिद्धांत है कि प्रत्येक व्यक्ति एक मनुष्य के रूप में कुछ अधिकारों का हकदार होता है, और इसलिए अधिकारों का उपभोग किसी बहुसंख्यक या अल्पसंख्यक की इच्छा पर निर्भर नहीं होना चाहिए।

किसी भी बहुसंख्यक को इन अधिकारों को निरस्त करने का अधिकार नहीं होता है।मौलिक अधिकार भारत में राजनीतिक लोकतंत्र के विचार को बढ़ावा देने हेतु प्रावधान किया गया है।

यह कार्यपालिका के निरंकुश्ता एवं विधायिका के मनमानी कानून की सीमाओं के रूप में कार्य करता है। मौलिक अधिकार प्रकृति में न्याय संगत है। अर्थात मौलिक अधिकार को कोई छीन नहीं सकता है।

(5) नीति निर्देशक सिद्धांत 

बाबासाहेब भीमराव अंबेडकर के अनुसार राज्य के नीति- निर्देशक सिद्धांत भारतीय संविधान की एक नवीन विशेषता है। इसकी समायोजन संविधान के भाग- 4 में किया गया है।

भारतीय लोगों को सामाजिक और आर्थिक न्याय प्रदान करने हेतु नीति- निर्देशक सिद्धांतों को हमारे संविधान में शामिल किया गया था। नीति निर्देशक सिद्धांतों का उद्देश्य भारत में एक कल्याणकारी राज्य की स्थापना करना है। जहां पर कुछ लोगों के हाथों में धन का संकेंद्रण नहीं हो सकेगा ।

यह प्रकृति में न्यायोचित हैं। 1980 में मिनर्वा मिल्स मामले में कहा गया कि भारतीय संविधान की स्थापना मौलिक अधिकारों और निति- निदेशक सिद्धांतों के बीच संतुलन के आधार पर की गई है।

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(6). मौलिक कर्तव्य

भारत के मूल संविधान में नागरिकों के मौलिक कर्तव्यों का प्रावधान नहीं किया गया था। मूल कर्तव्य को स्वर्ण सिंह समिति के सिफारिश पर 42 वां संविधान संशोधन अधिनियम 1976 द्वारा शामिल किया गया है।

यह भारत के सभी नागरिकों के लिए 10 मौलिक कर्तव्यों की एक सूची प्रदान किया है। बाद में 86 वां संविधान संशोधन अधिनियम, 2002 के द्वारा भारतीय संविधान में एक और मूल कर्तव्य को जोड़ा गया। अधिकार लोगों को गारंटी के रूप में दिए जाते हैं।जबकि कर्तव्य ऐसे दायित्व हैं, जिन्हें पूरा करने की अपेक्षा प्रत्येक नागरिकों से जाती है।

हालांकि राज्य के नीति निर्देशक सिद्धांतों की तरह मौलिक कर्तव्य भी प्रकृति में न्यायोचित है। नीति निर्देशक सिद्धांत का उलंघन या अनुपालन न होने पर किसी प्रकार की कोई कानूनी कार्रवाई नहीं हो सकती है। भारतीय संविधान में वर्तमान में 11 मौलिक कर्तव्यों का उल्लेख किया गया है।

(7). सार्वभौमिक वयस्क मताधिकार 

भारतीय लोकतंत्र में एक व्यक्ति एक मत के आधार पर कार्य किया जाता है। भारत का प्रत्येक नागरिक जिसकी आयु 18 वर्ष या इससे अधिक का है, जाति, लिंग ,धर्म, नस्ल या स्थिति के आधार पर बिना भेदभाव किये सभी को चुनाव में वोट देने का अधिकार प्राप्त है। भारत का संविधान सार्वभौमिक वयस्क मताधिकार की पद्धति के माध्यम से भारत में राजनीतिक समानता स्थापित करता है।

(8). एकल नागरिकता

संघीय राज्य में आमतौर पर नागरिकों को दोहरी नागरिकता प्राप्त होता है। जैसा कि संयुक्त राज्य अमेरिका में है।

लेकिन भारतीय संविधान में केवल एक ही नागरिकता का प्रावधान किया गया है। इसका अर्थ यह है कि प्रत्येक भारतीय भारत का नागरिक है। चाहे उसका निवास स्थान या जन्म स्थान कुछ भी क्यों ना हो।

अगर कोई नागरिक किसी घटक राज्य जैसे कि बिहार, उत्तरांचल, उत्तर प्रदेश, झारखंड का नागरिक नहीं है। जिससे वह संबंधित हो सकता है ,लेकिन वह भारत का नागरिक बना रहता है।

(9). आपातकालीन प्रावधान

संविधान निर्माताओं के द्वारा यह अनुमान लगाया गया था ,कि देश में कभी-कभी ऐसी परिस्थितियों उत्पन्न हो सकती हैं ।जब सरकार को सामान्य रूप से काम चलाने में असहजता होगी। इसलिए ऐसी परिस्थितियों से निपटने के लिए भारतीय संविधान में आपातकालीन प्रावधानों किया गया।

आपातकालीन प्रावधान तीन प्रकार का होता है:-

✓युद्ध, बाहरी आक्रमण या सशस्त्र विद्रोह के करण आपातकाल( अनुच्छेद 352)

✓राज्यों में संवैधानिक तंत्र के विफलता से उत्पन्न आपातकाल (अनुच्छेद 356 और अनुच्छेद 365)

✓वित्तीय आपातकाल (अनुच्छेद 360)

इन तीनों प्रावधानों को शामिल करने के पीछे तर्कसंगत्ता देश की संप्रभुता, एकता ,अखंडता एवं सुरक्षा लोकतांत्रिक राजनीतिक व्यवस्था तथा संविधान की संरक्षण करना है ।

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(10).त्रिस्तरीय सरकार 

मूल रूप से भारतीय संविधान में दोहरी राजव्यवस्था प्रदान की गई थी।लेकिन 73वां एवं 74वां संवैधानिक संशोधन अधिनियम, 1992 के तहत एक तीसरा स्तर स्थानीय सरकार को शामिल किया गया है,जो दुनिया के किसी भी अन्य संविधान में नहीं पाया जाता है।

1992 के 73वां संविधान संशोधन के माध्यम से संविधान में एक नया भाग- 9 और एक नई अनुसूची 11 जोड़कर पंचायत को अर्थात स्थानीय सरकार को संवैधानिक मान्यता प्रदान की गई है।

इसी प्रकार 74 वां संविधान संशोधन अधिनियम 1992 के माध्यम से भारतीय संविधान में एक नया भाग 9 (क) और एक नई अनुसूची 12 जोड़कर नगर पालिकाओं अर्थात शहरी स्थानीय सरकार को भी संवैधानिक मान्यता प्रदान की गई है।

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अंत तक पढ़ने के लिए धन्यवाद।💐💐

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